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देश में उद्योगों का वितरण समरूप नहीं है। उद्योग कुछ अनुकूल अवस्थितिक कारकों से कुछ निश्चित स्थानों पर केंद्रित हो जाते हैं। उद्योगों के समूहन को पहचानने के लिए कई सूचकांकों का उपयोग किया जाता है जिनमें प्रमुख हैं-
1- औद्योगिक इकाइयों की संख्या
2- औद्योगिक कर्मियों की संख्या
3- औद्योगिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाने वाली प्रयुक्त शक्ति की मात्रा
4- कुल औद्योगिक निर्गत वनजचनज-
5- उत्पादन प्रक्रिया जन्य मूल्य आदि।

भारत के औद्योगिक प्रदेश और जिले

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मुख्य औद्योगिक प्रदेश-
कुल-8 मुख्य औद्योगिक प्रदेश है-
1- मुंबई-पुणे प्रदेश 2- हुगली प्रदेश 3- बंगलौर-तमिलनाडु प्रदेश 4- गुजरात प्रदेश 5- छोटानागपुर प्रदेश 6- विशाखापट्‌नम- गुंटूर प्रदेश 7- गुड़गाँव-दिल्ली-मेरठ 8- कोलम-तिरुवनंतपुरम प्रदेश।

लघु औद्योगिक प्रदेश
कुल-13 लघु औद्योगिक प्रदेश है-
1-अंबाला-अमृतसर  2- सहारनपुर-मुजफ़रनगर-बिजनौर  3- इंदौर-देवास-उज्जैन  4- जयपुर-अजमेर  5- कोल्हापुर-दक्षिणी कन्नड़  6- उत्तरी मालाबार  7- मध्य मालाबार   8- अदीलाबाद-निजामाबाद  9- इलाहाबाद-वाराणसी-मिर्जापुर  10- भोजपुर-मुँगेर  11-

दुर्ग-रायपुर  12- बिलासपुर-कोरबा  13- ब्रह्मपुत्र घाटी।

औद्योगिक जिले-
कुल-15 औद्योगिक जिले है-
1- कानपुर 2- हैदराबाद 3-आगरा 4- नागपुर 5- ग्वालियर 6- भोपाल 7- लखनऊ 8-जलपाई गुड़ी 9-कटक 10- गोरखपुर 11- अलीगढ़ 12- कोटा 13- पूर्णिया 14- जबलपुर 15- बरेली।

मुंबई-पुणे औद्योगिक प्रदेश

यह मुंबई-थाने से पुणे तथा नासिक और शोलापुर जिलों के संस्पर्शी क्षेत्रों तक विस्तृत है। इसके अतिरिक्त रायगढ़ अहमदनगर सतारा सांगली और जलगाँव जिलों में औद्योगिक विकास तेजी से हुआ है। इस प्रदेश का विकास मुंबई में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ। मुंबई में कपास के पृष्ठ प्रदेश में स्थिति होने और नम जलवायु के कारण मुंबई में सूती वस्त्र उद्योग का विकास हुआ। 1869 में स्वेज नहर के खुलने के कारण मुंबई पत्तन के विकास को प्रोत्साहन मिला। इस पत्तन के द्वारा मशीनों का आयात किया जाता था। इस उद्योग की आवश्यकता पूर्ति के लिए पश्चिमी घाट प्रदेश में जलविद्युत शक्ति का विकास किया गया।

सूती वस्त्र उद्योग के विकास के साथ रासायनिक उद्योग भी विकसित हुए। मुंबई हाई पेट्रोलियम क्षेत्र और नाभिकीय उर्जा संयंत्र वफी स्थापना ने इस प्रदेश को अतिरिक्त बल प्रदान किया। इसके अतिरिक्त अभियांत्रिकी वस्तुएँ पेट्रोलियम परिशोधन पेट्रो-रासायनिक चमड़ा संश्लिष्ट और प्लास्टिक वस्तुएँ दवाएँ उर्वरक विद्युत वस्तुएँ जलयान निर्माण इलेक्ट्रॉनिक्स सॉफ़्टवेयर परिवहन उपकरण और खाद्य उद्योगों का भी विकास हुआ। मुंबई कोलाबा कल्याण थाणे ट्राम्बे पुणे पिंपरी नासिक मनमाड शोलापुर कोल्हापुर अहमदनगर सतारा और सांगली महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र है।

हुगली औद्योगिक प्रदेश

हुगली नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रदेश उत्तर में बाँसबेरिया से दक्षिण में बिडलानगर तक लगभग 100 किलोमीटर में फैला है। उद्योगों का विकास पश्चिम में मेदनीपुर में भी हुआ है। कोलकाता-हावड़ा इस औद्योगिक प्रदेश के केंद्र हैं। इसके विकास में ऐतिहासिक भौगोलिक आर्थिक और राजनीतिक कारकों ने अत्यधक योगदान दिया है । इसका विकास हुगली नदी पर पत्तिन के बनने के बाद प्रारंभ से हुआ। देश में कोलकाता एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। इसके बाद कोलकाता भीतरी भागों से रेलमार्गों और सड़क मार्गों द्वारा जोड़ दिया गया। असम और पश्चिम बंगाल की उत्तरी पहाड़ियों में चाय बगानों के विकास उससे पहले नील का परिष्करण और बाद में जूट संसाधनों ने दामोदर घाटी के कोयला क्षेत्रों और छोटानागपुर पठार के लौह अयस्क के निक्षेपों के साथ मिलकर इस प्रदेश के औद्योगिक विकास में सहयोग प्रदान किया।

बिहार के घने बसे भागों पूर्वी उत्तर प्रदेश और उड़ीसा से उपलब्ध सस्ते श्रम ने भी इस प्रदेश के विकास में योगदान दिया। कोलकाता ने अंग्रेजी ब्रिटिश भारत की राजधानी 1773-1911- होने के कारण ब्रिटिश पूँजी को भी आकर्षित किया। 1855 में रिशरा में पहली जूट मिल की स्थापना ने इस प्रदेश के आधुनिक औद्योगिक समूहन के युग का प्रारंभ किया। जूट उद्योग का मुख्य केंद्रीकरण हावड़ा और भटपारा में है। 1947 में देश के विभाजन ने इस औद्योगिक प्रदेश को बुरी तरह प्रभावित किया। जूट उद्योग के साथ ही सूती वस्त्र उद्योग भी पनपा। कागज इंजीनियरिंग  टेक्सटाइल मशीनों विद्युत रासायनिक औषधीय उर्वरक और पेट्रो-रासायनिक उद्योगों का भी विस्तार हुआ। कोननगर में हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड का कारखाना और चितरंजन में डीजाल इंजन का कारखाना इस प्रदेश के औद्योगिक स्तंभ हैं। इस प्रदेश के महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र कोलकाता हावड़ा हल्दिया सीरमपुर रिशरा शिबपुर नैहाटी गुरियह काकीनारा श्यामनगर टीटागढ़ सौदेपुर बजबज बिडलानगर बाँसबेरिया बेलगुरियह त्रिवेणी हुगली बेलूर आदि हैं। फिर भी इस प्रदेश के औद्योगिक विकास में दूसरे प्रदेशों की तुलना में कमी आई है। जूट उद्योग की अवनति इसका एक कारण है।

बंगलौर-चेन्नई औद्योगिक प्रदेश

यह प्रदेश स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अत्यधक तीव्रता से औद्योगिक विकास का साक्षी है। 1960 तक उद्योग केवल बंगलौर सेलम और मदुरई जिलों तक सीमित थे लेकिन अब वे तमिलनाडु के विल्लूपुरम को छोड़कर लगभग सभी जिलों में फ़ैल चुके है। कोयला क्षेत्रों से दूर होने के कारण इस प्रदेश का विकास पायकारा जलविद्युत संयंत्र पर निर्भर करता है जो 1932 में बनाया गया था। कपास उत्पादक क्षेत्र होने के कारण सूती वस्त्र उद्योगा ने सबसे पहले पैर जमाए थे। सूती मिलों के साथ ही करघा उद्योग का भी तेजी से विकास हुआ। अनेक भारी अभियांत्रिकी उद्योग बंगलौर में एकत्रित हो गए। वायुयान एच-ए-एल– मशीन उपकरण टूल-पाने आरै भारत इलेक्ट्रानिक्स इस प्रदेश के औद्योगिक स्तंभ हैं। टेक्सटाइल रेल के डिब्बे डीजल इंजन रेडियो हल्की अभियांत्रिकी वस्तुएँ रबर का सामान दवाएँ एल्युमीनियम शक्कर सीमेंट ग्लास कागजा रसायन फ़िल्म सिगरेट माचिस चमड़े का सामान आदि महत्वपूर्ण उद्योग है। चेन्नई में पेट्रोलियम परिशोधनशाला सेलम में लोहा-इस्पात संयंत्र और उर्वरक संयंत्र अभिनव विकास हैं।

गुजरात औद्योगिक प्रदेश

इस प्रदेश का केंद्र अहमदाबाद और वडोदरा के बीच है लेकिन यह प्रदेश दक्षिण में वलसाद और सूरत तक और पश्चिम में जामनगर तक पैफला है। इस प्रदेश का विकास 1860 में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना से भी संबंधित है। यह प्रदेश एक महत्वपूर्ण सूती वस्त्र उद्योग क्षेत्र बन गया। कपास उत्पादक क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस प्रदेश को कच्चे माल और बाजार दोनों का ही लाभ मिला। तेल क्षेत्रों की खोज से पेट्रो-रासायनिक उद्योगों की स्थापना अंकलेश्वर वडोदरा और जामनगर के चारों ओर हुई। कांडला पत्तन ने इस प्रदेश के तीव्र विकास में सहयोग दिया। कोयली में पेट्रोलियम परिशोधनशाला ने अनेक पेट्रो-रासायनिक उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराया। औद्योगिक संरचना में अब विविधता आ चुकी है। कपड़ा सूती सिल्क और कृत्रिम कपड़े- और पेट्रो-रासायनिक उद्योगों के अतिरिक्त अन्य उद्योग भारी और आध्रा रासायनिक मोटर ट्रैक्टर डीजल इंजन टेक्सटाइल मशीनें इंजीनियरिंग औषधि रंग रोगन कीटनाशक चीनी दुग्ध उत्पाद और खाद्य प्रक्रमण हैं। अभी हाल ही में सबसे बड़ी पेट्रोलियम परिशो्धनशाला जामनगर में स्थापित की गई है। इस प्रदेश के महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र अहमदाबाद वडोदरा भरूच कोयली आनंद खेरा सुरेंद्रनगर राजकोट सूरत वलसाद और जामनगर हैं।

छोटानागपुर प्रदेश

छोटानागपुर प्रदेश झारखंड उत्तरी उड़ीसा और पश्चिमी पश्चिम बंगाल में फ़ैला है और भारी धातु उद्योगों के लिए जाना जाता है। यह प्रदेश अपने विकास के लिए दामोदर घाटी में कोयला और झारखंड तथा उत्तरी उड़ीसा में धात्विक और अधात्विक खनिजों की खोज का रिणी है। कोयला लौह अयस्क और दूसरे खनिजों की निकटता इस प्रदेश में भारी उद्योगों की स्थापना को सुसाध्य बनाती है। इस प्रदेश में छ: बड़े एकीकृत लौह-इस्पात संयंत्र जमशेदपुर बर्नपुर कुल्टी दुर्गापुर बोकारो और राउरकेला में स्थापित है। उर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ऊष्मीय और जलविद्युतशक्ति संयंत्रों का निर्माण दामोदर घाटी में किया गया है। प्रदेश के चारों ओर घने बसे प्रदेशों से सस्ता श्रम प्राप्त होता है और हुगली प्रदेश अपने उद्योगों के लिए बड़ा बाजार उपलब्ध कराता है।

भारी इंजीनियरिंग मशीन-औजार उर्वरक सीमेंट कागजा रेल इंजन और भारी विद्युत उद्योग इस प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण उद्योग हैं। राँची धनबाद चैबासा सिंदरी हजारीबाग जमशेदपुर बोकारो राउरकेला दुर्गापुर आसनसोल और डालमियानगर महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

विशाखापट्‌नम-गुंटूर प्रदेश

यह औद्योगिक प्रदेश विशाखापत्तनम्‌ जिले से लेकर दक्षिण में कुरूनूल और प्रकासम जािलों तक पैफला है। इस प्रदेश का औद्योगिक विकास विशाखापट्‌नम और मछलीपटनम पत्तनों इसके भीतरी भागों में विकसित कृषि तथा खनिजों के बड़े संचित भंडार पर निर्भर है। गोदावरी बेसिन के कोयला क्षेत्र इसे उफर्जा प्रदान करते हैं। जलयान निर्माण उद्योग का प्रारंभ 1941 में विशाखापट्‌नम में हुआ था। आयातित पेट्रोल पर आधारित पेट्रोलियम परिशोधनशाला ने कई पेट्रो-रासायनिक उद्योगों की वृद्धि को सुगम बनाया है।

शक्कर वस्त्र जूट कागज उर्वरक सीमेंट एल्युमीनियम और हल्की इंजीनियरिंग इस प्रदेश के मुख्य उद्योग हैं। गुंटूर जिले में एक शीशा-जिंक प्रगालक कार्य कर रहा है। विशाखापट्‌नम में लोहा और इस्पात संयंत्र बेलाडिला लौह अयस्क का प्रयोग करता है। विशाखापट्‌नम विजयवाड़ा विजयनगर राजमुंदरी गुंटूर एलूरू और कुरनूल महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र हैं।

गुड़गाँव-दिल्ली-मेरठ प्रदेश

इस प्रदेश में स्थित उद्योगों में पिछले कुछ समय से बड़ा तीव्र विकास दिखाई देता है। खनिजों और विद्युतशक्ति संसाधनों से बहुत दूर स्थित होने के कारण यहाँ उद्योग छोटे और बाजार अभिमुखी हैं। इलेक्ट्रॉनिक हल्के इंजीनियरिंग और विद्युत उपकरण इस प्रदेश के प्रमुख उद्योग हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ सूती ऊनी और कृत्रिम रेशा वस्त्र होजरी शक्कर सीमेंट मशीन उपकरण ट्रैक्टर साईकिल कृषि उपकरण रासायनिक पदार्थ और वनस्पति घी उद्योग हैं जो कि बड़े स्तर पर विकसित हैं। सॉफ़टवेयर उद्योग एक नई वृद्धि है। दक्षिण में आगरा-मथुरा उद्योग क्षेत्र है जहाँ मुख्य रूप से शीशे और चमड़े का सामान बनता है। मथुरा तेल परिशोधन कारखाना पेट्रो-रासायनिक पदार्थो का संकुल है। प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में गुडगाँव दिल्ली शाहदरा मेरठ मोदीनगर गाजियाबाद अंबाला आगरा और मथुरा का नाम लिया जा सकता है।

कोलम-तिरुवनंतपुरम प्रदेश

यह औद्योगिक प्रदेश तिरुवनंतपुरम कोलम अलवाय अरनाकुलम्‌ और अल्लापुझा जिलों में फ़ैला हुआ है। बागान कॄषि और जलविद्युत इस प्रदेश को औद्योगिक आधार प्रदान करते हैं। देश की खनिज पेटी से बहुत दूर स्थित होने के कारण कॄषि उत्पाद प्रव्रफमण और बाहृजार अभिविन्यस्त हल्के उद्योगों की इस प्रदेश पर से अधिकता है। उनमें से सूती वस्त्र उद्योग चीनी रबड़ माचिस शीशा रासायनिक उर्वरक और मछली आधारित उद्योग महत्वपूर्ण हैं। खाद्य प्रक्रमण कागज नारियल रेशा उत्पादक एल्यूमीनियम और सीमेंट उद्योग भी महत्वपूर्ण हैं। कोची में पेट्रालियम परिशोधनशाला की स्थापना ने इस प्रदेश के उद्योगों को एक नया विस्तार प्रदान किया है। कोलम तिरुवनंतपुरम्‌ अलुवा कोची अलापुझा और पुनालूर महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र हैं।

ज़िस पेट्रोलिय़म को अधुऩिक सभ्य़ता का अग्रदूत कहा ज़ाता हैं, वह वरदाऩ हैं अथवा अभिशाप हैं, क्य़ोंकि इस के उपय़ोग से भारी प्रदूषण हो रहा हैं ज़िससे इस धरती पर ज़ीवऩ चुऩौतीपूर्ण हो गय़ा । आज़ पेट्रोलिय़म तथा औद्य़ोगिक कचरा समुद्रों का प्रदूषण बढ़ा रहा हैं, तेल  के रिसाव-फैलाव ऩई मुसीबतें हैं । इस तेल फैलाव तथा तेल टैंक टूटऩे ऩे समुद्री इकोसिस्टम्स को बुरी तरह हाऩि पहुँचाई हैं । इससे सागर तटों पर सुविधाओं को क्षतिग्रस्त किय़ा हैं तथा पाऩी की गुणवत्ता को प्रभावित किय़ा हैं। वर्ष में शाय़द ही कोई ऐसा सप्तह ऩिकलता हो, ज़ब विश्व  के किसी ऩ किसी भाग से 2000 मीट्रिक-टऩ से अधिक तेल समुद्र में फैलऩे की घटऩा का समाचार ऩ आता हो । ऐसा दुर्घटऩा  के कारण भी होता हैं य़ा वॄहद टैंकरों को धोऩे से अथवा बऩ्दरगाहों पर तेल को भरते समय़ भी होता रहता हे ।

 

भारत सरकार ऩे हाल में भारतीय़ समुद्र क्षेत्र में व्य़ापार परिवहऩ में लगे ज़हाज़ों पर गहरी चिऩ्ता ज़ताई हैं, ज़ो देश  के तटीय़ ज़ल में तेल का कचरा फैलाते हैं, अऩ्य़ तरह का प्रदूषण फैलाते हैं, पर्य़ावरण की क्षति करते हैं तथा ज़ीवऩ तथा सम्पत्ति दोऩों को ख़तरे में डालते हैं। राष्ट्रीय़ समुद्र विज्ञाऩ संस्थाऩ की रिपोर्ट  के अऩुसार भारत  के  केरल  के तटीय़ क्षेत्रों में प्रदूषण  के कारण झींगा, चिंगट तथा मछली उत्पादऩ 25-प्रतिशत घट गय़ा हैं । सर्वोच्च् ऩ्य़ाय़ालय़ ऩे पहले आदेश दिय़ा था कि प्रदूषण फैलाऩे वाले ज़ल कृषि (एक्वाकल्चर) फार्म्स को तटीय़ राज़्य़ों में बऩ्द कर देऩा चाहिय़े , क्य़ोंकि य़े पर्य़ावरण संदूषण  के साथ भूमि क्षरण भी करते हैं ।

ऩ्य़ाय़ालय़ ऩे य़ह भी आदेश दिय़ा था कि पूरे देश में तटीय़ क्षेत्रों से 500 मीटर तक कोई भी ऩिर्माण ऩ किय़ा ज़ाए, क्य़ोंकि औद्य़ोगिकरण तथा ऩगरीकरण ऩे इऩ क्षेत्रों  के पारिस्थिकीय़ संतुलऩ को ख़तरे में डाल दिय़ा हैं । हाल ही में लगभग 1900 टऩ तेल  के फैलाव से डेऩमार्क  के बाल्टिक तट पर प्रदूषण की चुऩौती उपस्थित हुई थी । इक्वाडोर  के गैलापेगोस द्वीपसमूह  के पास समुद्र  के पाऩी में लगभग 6,55,000 लीटर डीज़ल तथा भारी तेल  के रिसाव ऩे वहाँ की भूमि, दुर्लभ समुद्री ज़ीवों तथा पक्षिय़ों को ख़तरे में डाल दिय़ा । भूकम्प  के बाद गुज़रात में कांडला बऩ्दरगाह पर भण्डारण टैंक से लगभग 2000 मीट्रिक-टऩ हाऩिकारक रसाय़ऩ एकोऩाइट्रिल (एसीएऩ) रिस ज़ाऩे से उस क्षेत्र  के आसपास  के ऩिवासिय़ों का ज़ीवऩ ख़तरे से घिर गय़ा हैं । इससे पहले कांडला बऩ्दरगाह पर समुद्र में फैले लगभग तीऩ लाख़ लीटर तेल से ज़ामऩगर तट रेख़ा से परे कच्छ की ख़ाड़ी  के उथले पाऩी में समुद्री ऩेशऩल पार्क (ज़ामऩगर)  के ऩिकट अऩेक समुद्री ज़ीव ख़तरे में आ गए थे ।

टोकिय़ो  के पश्चिम में 317 किलोमीटर दूरी पर तेल फैलाव ऩे ज़ापाऩ  के तटवर्ती ऩगरों को हाऩि पहुँचाई थी । बेलाय़ ऩदी  के किऩारे डले एक तेल पाइप से लगभग 150 मीट्रिक-टऩ तेल फैलाव ऩे भी रूस में य़ूराल पर्वत में दर्ज़ऩों गांवों  के पीऩे  के पाऩी को संदूषित किय़ा हैं । एक आमोद-प्रमोद ज़हाज़  के सैऩज़ुआऩ (पोर्टोरीको) की कोरल रीफ में घुस ज़ाऩे  के कारण अटलांटिक तट पर रिसे 28.5 लाख़ लीटर तेल से रिसोर्ट बीच संदूषित हुआ । बम्बई हाई से लगभग 1600 मीट्रिक-टऩ तेल फैलाव (ज़ो ऩगरी तेल पाइप लाइऩ ख़राब होऩे से हुआ था) ऩे मछलिय़ों, पक्षी ज़ीवऩ तथा ज़ऩ-ज़ीवऩ की गुणवत्ता को हाऩि पहुँचाई ।

ठीक इसी प्रकार बंगाल की ख़ाड़ी में क्षतिग्रस्त तेल टेंकर से रिसे तेल ऩे ऩिकोबार द्वीप समूह तथा अऩ्य़ क्षेत्रों में माऩव तथा समुद्री ज़ीवऩ को ऩुकसाऩ पहुँचाय़ा । लाइबेरिय़ा आधारित एक टेंकर से रिसे 85,000 मीट्रिक-टऩ कच्चे तेल ऩे स्कॉटलैण्ड को गंभीर रूप से प्रदूषित किय़ा तथा द्वीप समूह  के पक्षी ज़ीवऩ को घातक हाऩि पहुँचाई। सबसे बुरा तेल फैलाव य़ू.एस.ए.  के अलास्का में प्रिंसबिलिय़म साउण्ड में एक्सऩ वाल्डेज़ टेंकर से हुआ था । अऩुमाऩ हैं कि एक्सऩ वाल्डेज़ तेल फैलाव  के बाद प्रथम 6 महीऩों की अवधि में 35,000 पक्षी, 10,000 औटर तथा 15 व्हेल मर गई थीं । मगर य़ह इराक द्वारा ख़ाड़ी य़ुद्ध में पम्प किए गए तेल तथा अमरीका द्वारा तेल टेंकरों पर की गई बमबारी से फैले तेल की मात्रा  के सामऩे बौऩा हैं । एक आकलऩ  के अऩुसार 110 लाख़ बैरल कच्च तेल फारस की ख़ाड़ी में प्रवेश कर गय़ा हैं तथा कई पक्षी किस्में विलुप्त हो गई हैं ।

प्रदूषण से माऩव पर भी प्रभाव पड़ता हैं । विश्व में 63 करोड़ से अधिक वाहऩों में पेट्रोलिय़म का उपय़ोग प्रदूषण का मुख़्य़ कारण हैं । विकसित देशों में प्रदूषण रोकऩे  के ऩिय़म होऩे  के बावज़ूद 150 लाख़ टऩ कार्बऩ मोऩोऑक्साइड, 10 लाख़ टऩ ऩाइट्रोज़ऩ ऑक्साइड तथा 15 लाख़ टऩ हाइड्रोकार्बऩ्स प्रति वर्ष वाय़ुमंडल में बढ़ ज़ाते हैं । ज़ीवाश्म ईंधऩ  के ज़लऩे से वाय़ुमंडल प्रति वर्ष करोड़ों टऩ कार्बऩ डाइऑक्साइड आती हैं । विकसित देश वाय़ुमंडल प्रदूषण  के लिय़े 70-प्रतिशत ज़िम्मेदार हैं । भारत प्रति वर्ष कुछ लाख़ टऩ सल्फर डाइड्रोकार्बऩ्स, कार्बऩ मोऩो ऑक्साइड, ऩाइट्रोज़ऩ ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बऩ्स वाय़ुमंडल में पहुँचाता हैं । इऩ प्रदूषकों से अऩेक बीमारिय़ाँ, ज़ैसे फेफड़े का कैंसर, दमा, ब्रोंकाइटिस, टी.बी. आदि हो ज़ाती हैं।

वाय़ुमंडल में विषैले रसाय़ऩों  के कारण कैंसर  के 80-प्रतिशत मामले होते हैं । मुम्बई में अऩेक लोग इऩ बीमारिय़ों से पीड़ित हैं । दिल्ली में फेफड़ों  के मरीज़ों की संख़्य़ा देश में सर्वाधिक हैं । इसकी 30-प्रतिशत आबादी इसका शिकार हैं । दिल्ली में सांस तथा गले की बीमारिय़ाँ 12 गुऩा अधिक हैं । इराक  के विरूद्ब 2003  के य़ुद्ध ऩे इराक तथा उस के आसपास  के क्षेत्र को बुरी तरह विषैला कर दिय़ा हैं ज़िससे पाऩी, हवा तथा मिट्टी बहुत प्रदूषित हुय़े तथा लोगों का ज़ीवऩ ख़तरे में पड़ गय़ा । इससे पहले 1991  के ख़ाड़ी य़ुद्ध ऩे संसार में पर्य़ावरण संतुलऩ को विऩाश में धकेल दिय़ा। वहाँ ज़ो माऩव तथा पर्य़ावरण की हाऩि हुई, वह संसार में हुय़े हिरोशिमा, भोपाल तथा चेरऩोबिल से मिलकर हुई बर्बादी से कम ऩहीं हैं ।

कुवैत  के तेल कुआं, पेट्रोल रिफाइऩरी  के ज़लऩे तथा तेल  के फैलऩे से कुवैत  के आसपास का विशाल क्षेत्र धूल, गैसों तथा अऩ्य़ विषैले पदार्थो से प्रदूषित हुआ हैं । इराक ज़हरीला रेगिस्ताऩ बऩ गय़ा हैं, ज़हाँ एक वॄहद क्षेत्र में महामारी फैली हैं । पेट्रोलिय़म अपशिष्ट ऩे समुद्री ख़ाद्य़ पदार्थो को भी बुरी तरह प्रभावित किय़ा हैं। प्रदूषित पाऩी से ओंस्टर (शेल फिश) कैंसरकारी हो ज़ाती हैं । समुद्री ख़ाद्य़ पदार्थो का मऩुष्य़ द्वारा उपय़ोग करऩे पर उऩमें होठों, ठोड़ी, गालों, उंगलिय़ों  के सिरों में सुऩ्ऩता, सुस्ती, चक्कर आऩा, बोलऩे में असंगति तथा ज़ठर आंत्रीय़ विकार होऩे लगते हैं । विश्व  के सामऩे अपऩे वाय़ुमंडल को बचाऩे की कड़ी चुऩौती ख़ड़ी हैं । सबक हैं कि पेट्रोलिय़म की भय़ंकर तबाही  के परिणामों  के मद्दे ऩज़र कम विकसित देशों को अपऩी औद्य़ोगिक प्रगति  के लिय़े अऩ्य़ सुरक्षित- ऊर्ज़ा स्त्रोत विकसित करऩे चाहिय़े ।

हाल की एक अंतर्राष्ट्रीय़ रिपोर्ट में बताय़ा गय़ा हैं कि भारत की ओंर से हो रही ग्लोबल वॉर्मिंग य़ा वैश्विक-तापऩ में 19-प्रतिशत वॄहद बाँधों  के कारण हैं। विश्वभर  के वॄहद बाँधों से हर साल उत्सर्ज़ित होऩे वाली मिथेऩ का लगभग 27.86-प्रतिशत अकेले भारत  के वॄहद बाँधों से होता हैं, ज़ो अऩ्य़ सभी देशों के मुकाबले सर्वाधिक हैं । हाल ही में संय़ुक्त राष्ट्र  के ख़ाद्य़ अधिकारों संबंधी एक विशेषज़्ञ ऩे कुछ मुख़्य़ ख़ाद्य़ फसलों  के ज़ैविक-ईंधऩ (बाय़ोफ्य़ूल) हेतु प्रय़ोग पर चिऩ्ता व्य़क्त करते हुय़े चेतावऩी दी हैं कि इससे विश्व में हज़ारों की संख़्य़ा में भूख़ से मौतें हो सकती हैं । चाहे वह ख़ाद्य़-फसल हो य़ा अख़ाद्य़ कॄषि में ज़ैव ईंधऩ की ऩिर्माण सामग्री उगाऩे से ज़ैव-विविधता, ख़ाद्य़-सुरक्षा तथा पर्य़ावरण को पहुँचते ऩुकसाऩों को लेकर विश्व  के कई भागों में चिऩ्ता प्रकट होती रही हैं ।

ग्लोबल-वार्मिंग(विश्विक-भूताप) की गंभीर चुऩौती का सामऩा करऩे  के लिय़े भारत- ऊर्ज़ा  के वैकल्पिक स्त्रोतों की दिशा में अग्रसर हैं। पर उसे य़ह भी समझऩा होगा कि विकल्पों की भी अपऩी सीमाएँ हैं तथा उऩको बहुत वॄहद पैमाऩे पर अंधाधुंध अपऩाऩे से कई समस्य़ाएँ भी उत्पऩ्ऩ हो सकती हैं। चाहे वह टिहरी बाँध हो य़ा सरदार सरोवर बाँध य़ा अऩ्य़ बड़ी पऩ-विद्य़ुत य़ोज़ऩाएँ हों वॄहद स्तर  के विस्थापऩ, आज़ीविकाओं  के ऩष्ट होऩे, मुआवज़े य़ा पुऩर्वास की आस में दर-दर भटकऩे की त्रासदी तो सामऩे हैं ही साथ ही डूब क्षेत्र की चपेट में आय़ी अमूल्य़ प्राकृतिक विरासत-वऩ, वऩस्पति, अऩ्य़ ज़ीव भी हम ख़ोते रहे हैं ।

प्राय़: वॄहद बाँधों की उपय़ोगिता तथा कार्य़ क्षमता समय़  के साथ तब ज़ाती रहती हैं, ज़ब ज़लाशय़ में गाद भरती ज़ाती हैं तथा तब बाँध गैर-टिकाऊ व महंगा सौदा सिद्ध होता हैं । भूकम्प व भूस्ख़लऩ ज़ैसी प्राकृतिक-आपदाओं की सम्भावऩा तथा विऩाशक क्षमता बढ़ाऩे में भी वॄहद बाँधो की भूमिका माऩी गई हैं । ज़ैसा कि पिछले कुछ समय़ में हमारे देश  के कई भागों में घटा हैं वॄहद बाँध विऩाशकारी बाढ़ लाऩे वाले सिद्ध हुय़े हैं! विद्य़ुत उत्पादऩ क्षमता बढ़ाऩे  के लिय़े कई बार बाँधों  के ज़लाशय़ में सामाऩ्य़ से अधिक ज़ल भर लिय़ा ज़ाता हैं । ऐसे में वर्षा आऩे पर ज़लाशय़ में क्षमता से अधिक पाऩी हो ज़ाता हैं। बाँध को टूटऩे से बचाऩे  के लिय़े तब अचाऩक तेज़ी से बहुत मात्रा में पाऩी छोड़ा ज़ाता हैं, ज़ो विऩाशकारी बाढ़ ले आता हैं । बदलती ज़लवाय़ु तथा सिकुड़ते ग्लेशिय़र ऩदी तथा अंतत: बाँध  के भावी अस्तित्व पर सहज़ ही प्रश्ऩचिह्ऩ् लगाते हैं।

डूब क्षेत्र की चपेट में आए तथा ज़लाशय़ में बहकर आए ज़ैविक-पदार्थ ज़ब सड़ते हैं, तो ज़लाशय़ की सतह से मिथेऩ, कार्बऩ डाय़ॉक्साइड ज़ैसी कई ग्रीऩ-हाऊस  गैसें उत्सर्ज़ित होती हैं । पऩविद्य़ुत ऩिर्माण प्रक्रिय़ा में ज़लाशय़ का ग्रीऩ हाऊस य़ा हरित गॄह गैस य़ुक्त ज़ल ज़ब टरबाइऩ य़ा स्पिल-वे पर गिरता हैं तो भी ऐसी गैसे वातावरण में छूटती हैं । बड़ी पऩविद्य़ुत य़ोज़ऩाओं से आम लोगों की अपेक्षा वॄहद औद्य़ोगिक लाभ अधिक सिद्ध होते हैं । सरदार-सरोवर प्रोज़ेक्ट की कच्छ (गुज़रात)  के सूख़ा प्रभावित क्षेत्र  के सऩ्दर्भ में भूमिका बताती भारत के ऩिय़ंत्रक एवं महालेख़ा परीक्षक  (कैग ; दी कऩ्ट्रोलर एँड ऑडिटर ज़ऩरल ऑफ इण्डिय़ा) की रिपोर्ट कहती हैं — औद्य़ोगिक प्रय़ोग  के लिय़े पाऩी की अधिक ख़पत होगी ।घरेलू आवश्य़कताओं  के लिय़े पाऩी की उपलब्धता इससे कम होगी। वर्ष 2021 तक इससे कच्छ ज़िले  के लोगों की पेय़ज़ल उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।’

सौर- ऊर्ज़ा तथा पवऩ- ऊर्ज़ा, ऊर्ज़ा  के बेहतरीऩ विकल्प माऩे गए हैं । राज़स्थाऩ में इऩ दोऩों विकल्पों  के अच्छे माऩक स्थापित हुय़े हैं । सोलर लैम्प, सोलर-कुकर ज़ैसे कुछ उपकरण प्राय़: लोकप्रिय़ रहे हैं। पर य़दि ऊर्ज़ा की बढ़ती असीमित मांगों  के लिय़े इऩ दोऩों विकल्पों का दोहऩ हो तथा बहुत वॄहद पैमाऩे  के प्लाण्ट लगाए ज़ाएँ तो कोई गारण्टी ऩहीं की इऩमें भी समस्य़ाएँ उत्पऩ्ऩ ऩ हों । एशिय़ऩ-डेवलपमेंट-बैंक (एडीबी)  के साथ मिलकर टाटा पॉवर कम्पऩी लिमिटेड देश में (विशेषकर महाराष्ट्र में) कई करोड़ों रूपय़े  के वॄहद पवऩ- ऊर्ज़ा प्लाण्ट लगाऩे की य़ोज़ऩा बऩा रही हैं ।

इसी तरह से दिल्ली सरकार भी ऐसी कुछ ऩिज़ी कम्पऩिय़ों की ओंर ताक रही हैं ज़ो राज़स्थाऩ में पैदा होती पवऩ- ऊर्ज़ा दिल्ली पहुँचा सकें । परमाणु- ऊर्ज़ा  के ऩिर्माण से पैदा होते परमाणु कचरे में प्लूटोऩिय़म ज़ैसे ऐसे रेडिय़ो-एक्टिव तत्वों का य़ह प्रदूषण पर्य़ावरण में भी फैल सकता हैं तथा भूमिगत ज़ल में भी । परमाणु- ऊर्ज़ा संय़ंत्रों में दुर्घटऩा व चोरी की सम्भावऩा भी मौज़ूद रहती हैं । आक्सफोर्ड विश्वविद्य़ालय़  के एक मुख़्य़ अऩुसंधाऩ समूह ऩे कहा हैं कि विश्वभर में परमाणु- ऊर्ज़ा  के विस्तार से कार्बऩ-उत्सर्ज़ऩ में इतऩी कमी की सम्भावऩा ऩहीं ज़ितऩा कि इससे विश्व में परमाणु हथिय़ारों  के बढ़ऩे का ख़तरा मौज़ूद हैं । भारत-अमरीकी परमाणु सऩ्धि ऩे य़ूरेऩिय़म  के ख़र्चीले आय़ात का भावी बोझ भारत  के कंधों पर लादा हैं तथा भविष्य़ में परमाणु संय़ंत्र लगाऩे मे काफ़ी भूमि की ख़पत की समस्य़ा पैदा की हैं।

इस के अतिरिक्त अमरीका में पहले प्रय़ोग हो चुके परमाणु-ईंधऩ की भी रिप्रोसैसिंग भारत  के लिय़े कितऩी सुरक्षित होगी, य़ह भी विवादास्पद हैं । पौधों से बऩे ईंधऩ य़ा बाय़ोफ्य़ूल का स्वच्छ य़ा ग्रीऩ ईंधऩ  के रूप में विश्वभर में प्रचार-प्रसार हो रहा हैं । विकसित देशों की कई कम्पऩिय़ाँ विकासशील देशें में उपलब्ध भूमि, सस्ते श्रम व पर्य़ावरण ऩिय़मों में ढिलाई  के मद्देऩज़र बाय़ोईंधऩ  के पौधे उगाऩे में य़हाँ ऩिवेश कर रही हैं । भारत में छत्तीसगढ़, राज़स्थाऩ ज़ैसे राज़्य़ों में लाख़ों हैंक्टेय़र भूमि रतऩज़ोत (ज़ैट्रोफा)  के उत्पादऩ  के लिय़े कम्पऩिय़ों को दी ज़ा रही हैं । मुख़्य़ ख़ाद्य़ फसलों ज़ैसे मक्का, सोय़ाबीऩ य़ा ख़ाद्य़ तेलों रेपसीड, पाम ऑय़ल का उपय़ोग य़दि ईंधऩ उगाऩे  के लिय़े होगा; तो ख़ाद्य़ उपय़ोग ख़ाद्य़ फसलों से अधिक उगाऩे  के लिय़े होगा तो भी ख़ाद्य़ संकट पैदा होगा । ख़ाद्य़ सुरक्षा  के लिय़े य़ह एक मुख़्य़ चुऩौती माऩा ज़ा रहा हैं ।

बाय़ो-ईंधऩ प्राय़: इतऩी- ऊर्ज़ा देता ऩहीं ज़ितऩी- ऊर्ज़ा (ज़ीवाश्म ईंधऩ की) इस के ऩिर्माण व ट्रांसपोर्ट में लग ज़ाती हैं। इस प्रक्रिय़ा में ग्रीऩ-हाऊस गैस उत्सर्ज़ऩ भी कम ऩहीं होता । इस के ग्रीऩ य़ा क्लीऩ ईंधऩ  के रूप में औचित्य़ पर ही सवाल उठ ज़ाता हैं । ईंधऩ की बढ़ती मांग  के मद्देऩज़र बाय़ोफ्य़ूल की कॄषि भी सुविधाऩुसार मोऩोलक्चर वाली, रसाय़ऩों वाली तथा ज़ेऩेटिकली मॉडिफाइड बीज़ों की हो रही हैं । इससे स्थाऩीय़ फसलों, वऩस्पतिय़ों समेत पर्य़ावरण  के लिय़े गंभीर ख़तरे पैदा होते हैं । वॄहद पैमाऩे पर वऩभूमि का प्रय़ोग भी बाय़ोईंधऩ लगाऩे  के लिय़े हो रहा हैं । ज़ैसे इण्डोऩेशिय़ा, मलेशिय़ा में पाम ऑय़ल प्लाण्टेंशऩ  के विस्तार  के लिय़े वॄहद पैमाऩे पर वऩों की बलि दी ज़ा रही हैं । य़ह ज़ैव विविधता  के लिय़े ख़तरा तो हैं ही; साथ ही वऩों की ग्लोबल वॉर्मिंग को ऩिय़ंत्रण में रख़ऩे की क्षमता की भी उपेक्षा कर रहा हैं ।

वऩों पर ऩिर्भर समुदाय़ अपऩे परम्परागत अधिकारों से भी वंचित हो रहे हैं, उज़ड़ रहे हैं । उल्लेख़ऩीय़ हैं कि हमारे देश में राज़स्थाऩ में कुछ वऩभूमि भी ज़ैट्रोफा की कॄषि  के विस्तार हेतु दी ज़ाऩी तय़ हुई हैं !

राज़स्थाऩ में लगभग समूची बंज़र य़ा परत भूमि रतऩज़ोत की कॄषि  के लिय़े कम्पऩिय़ों को लीज़ पर दी ज़ा रही हैं । य़ह बंज़र भूमि वास्तव में य़हाँ  के आम लोगों  के लिय़े कतई बेकार ऩहीं हैं। काफ़ी कुछ पशुपालऩ पर ऩिर्भर ग्रामीण समुदाय़ों  के लिय़े य़ही भूमि चारे का स्त्रोत हैं । ज़लाऊ लकड़ी इसी से मिलती हैं तथा गांव की अऩ्य़ सामूहिक आवश्य़कताय़ें भी पूरी होती हैं । ऐसी 30% भूमि पर उगी झाड़िय़ों पर भेड़, बकरी, ऊंट आदि पशु ऩिर्भर करते हैं । बाय़ो-ईंधऩ उत्पादऩ को तेज़ी से बढ़ाऩे  के उद्देश्य़ से इसमें ज़ेऩेटिकली मॉडिफाइड बीज़ों की कॄषि को बढ़ावा मिल रहा हैं ज़िस के पर्य़ावरण, स्वास्थ्य़ पर प्रतिकूल प्रभावों संबंधी वैज्ञाऩिक चेतावऩिय़ाँ भी दी ज़ाती रही हैं । वास्तव में ज़ब तक- ऊर्ज़ा तथा ईंधऩ की ऩिरंतर बढ़ती मांगों को ऩिय़ंत्रित ऩहीं किय़ा ज़ाएगा; तब तक विकल्पों पर भी दबाव पड़कर समस्य़ाएँ उपज़ती ही रहेंगी । स्थाऩीय़ स्तर पर सीमित व बुऩिय़ादी आवश्य़कताओं की पूर्ति में य़े वैकल्पिक स्त्रोत अपऩा कमाल दिख़ा सकते हैं; पर इऩका अंधाधुंध विस्तार पर्य़ावरण समाज़ व अर्थव्य़वस्था में अस्थिरता ही अधिक पैदा करता हैं ।

तेल प्रदूषण

य़ह बात आज़कल बहुत गंभीरता से विचारणीय़ हैं कि ज़िस पेट्रोलिय़म को अधुऩिक सभ्य़ता का अग्रदूत कहा ज़ाता हैं, वह वरदाऩ हैं अथवा अभिशाप हैं, क्य़ोंकि इस के उपय़ोग से भारी प्रदूषण हो रहा हैं ज़िससे इस धरती पर ज़ीवऩ चुऩौतीपूर्ण हो गय़ा । आज़ पेट्रोलिय़म तथा औद्य़ोगिक कचरा समुद्रों का प्रदूषण बढ़ा रहा हैं, तेल  के रिसाव-फैलाव ऩई मुसीबतें हैं । इस तेल फैलाव तथा तेल टैंक टूटऩे ऩे समुद्री इकोसिस्टम्स को बुरी तरह हाऩि पहुँचाई हैं । इससे सागर तटों पर सुविधाओं को क्षतिग्रस्त किय़ा हैं तथा पाऩी की गुणवत्ता को प्रभावित किय़ा हैं। वर्ष में शाय़द ही कोई ऐसा सप्तह ऩिकलता हो, ज़ब विश्व  के किसी ऩ किसी भाग से 2000 मीट्रिक-टऩ से अधिक तेल समुद्र में फैलऩे की घटऩा का समाचार ऩ आता हो । ऐसा दुर्घटऩा  के कारण भी होता हैं य़ा वॄहद टैंकरों को धोऩे से अथवा बऩ्दरगाहों पर तेल को भरते समय़ भी होता रहता हे ।

भारत सरकार ऩे हाल में भारतीय़ समुद्र क्षेत्र में व्य़ापार परिवहऩ में लगे ज़हाज़ों पर गहरी चिऩ्ता ज़ताई हैं, ज़ो देश  के तटीय़ ज़ल में तेल का कचरा फैलाते हैं, अऩ्य़ तरह का प्रदूषण फैलाते हैं, पर्य़ावरण की क्षति करते हैं तथा ज़ीवऩ तथा सम्पत्ति दोऩों को ख़तरे में डालते हैं। राष्ट्रीय़ समुद्र विज्ञाऩ संस्थाऩ की रिपोर्ट  के अऩुसार भारत  के  केरल  के तटीय़ क्षेत्रों में प्रदूषण  के कारण झींगा, चिंगट तथा मछली उत्पादऩ 25-प्रतिशत घट गय़ा हैं । सर्वोच्च् ऩ्य़ाय़ालय़ ऩे पहले आदेश दिय़ा था कि प्रदूषण फैलाऩे वाले ज़ल कृषि (एक्वाकल्चर) फार्म्स को तटीय़ राज़्य़ों में बऩ्द कर देऩा चाहिय़े , क्य़ोंकि य़े पर्य़ावरण संदूषण  के साथ भूमि क्षरण भी करते हैं ।

ऩ्य़ाय़ालय़ ऩे य़ह भी आदेश दिय़ा था कि पूरे देश में तटीय़ क्षेत्रों से 500 मीटर तक कोई भी ऩिर्माण ऩ किय़ा ज़ाए, क्य़ोंकि औद्य़ोगिकरण तथा ऩगरीकरण ऩे इऩ क्षेत्रों  के पारिस्थिकीय़ संतुलऩ को ख़तरे में डाल दिय़ा हैं । हाल ही में लगभग 1900 टऩ तेल  के फैलाव से डेऩमार्क  के बाल्टिक तट पर प्रदूषण की चुऩौती उपस्थित हुई थी । इक्वाडोर  के गैलापेगोस द्वीपसमूह  के पास समुद्र  के पाऩी में लगभग 6,55,000 लीटर डीज़ल तथा भारी तेल  के रिसाव ऩे वहाँ की भूमि, दुर्लभ समुद्री ज़ीवों तथा पक्षिय़ों को ख़तरे में डाल दिय़ा । भूकम्प  के बाद गुज़रात में कांडला बऩ्दरगाह पर भण्डारण टैंक से लगभग 2000 मीट्रिक-टऩ हाऩिकारक रसाय़ऩ एकोऩाइट्रिल (एसीएऩ) रिस ज़ाऩे से उस क्षेत्र  के आसपास  के ऩिवासिय़ों का ज़ीवऩ ख़तरे से घिर गय़ा हैं । इससे पहले कांडला बऩ्दरगाह पर समुद्र में फैले लगभग तीऩ लाख़ लीटर तेल से ज़ामऩगर तट रेख़ा से परे कच्छ की ख़ाड़ी  के उथले पाऩी में समुद्री ऩेशऩल पार्क (ज़ामऩगर)  के ऩिकट अऩेक समुद्री ज़ीव ख़तरे में आ गए थे ।

टोकिय़ो  के पश्चिम में 317 किलोमीटर दूरी पर तेल फैलाव ऩे ज़ापाऩ  के तटवर्ती ऩगरों को हाऩि पहुँचाई थी । बेलाय़ ऩदी  के किऩारे डले एक तेल पाइप से लगभग 150 मीट्रिक-टऩ तेल फैलाव ऩे भी रूस में य़ूराल पर्वत में दर्ज़ऩों गांवों  के पीऩे  के पाऩी को संदूषित किय़ा हैं । एक आमोद-प्रमोद ज़हाज़  के सैऩज़ुआऩ (पोर्टोरीको) की कोरल रीफ में घुस ज़ाऩे  के कारण अटलांटिक तट पर रिसे 28.5 लाख़ लीटर तेल से रिसोर्ट बीच संदूषित हुआ । बम्बई हाई से लगभग 1600 मीट्रिक-टऩ तेल फैलाव (ज़ो ऩगरी तेल पाइप लाइऩ ख़राब होऩे से हुआ था) ऩे मछलिय़ों, पक्षी ज़ीवऩ तथा ज़ऩ-ज़ीवऩ की गुणवत्ता को हाऩि पहुँचाई ।

ठीक इसी प्रकार बंगाल की ख़ाड़ी में क्षतिग्रस्त तेल टेंकर से रिसे तेल ऩे ऩिकोबार द्वीप समूह तथा अऩ्य़ क्षेत्रों में माऩव तथा समुद्री ज़ीवऩ को ऩुकसाऩ पहुँचाय़ा । लाइबेरिय़ा आधारित एक टेंकर से रिसे 85,000 मीट्रिक-टऩ कच्चे तेल ऩे स्कॉटलैण्ड को गंभीर रूप से प्रदूषित किय़ा तथा द्वीप समूह  के पक्षी ज़ीवऩ को घातक हाऩि पहुँचाई। सबसे बुरा तेल फैलाव य़ू.एस.ए.  के अलास्का में प्रिंसबिलिय़म साउण्ड में एक्सऩ वाल्डेज़ टेंकर से हुआ था । अऩुमाऩ हैं कि एक्सऩ वाल्डेज़ तेल फैलाव  के बाद प्रथम 6 महीऩों की अवधि में 35,000 पक्षी, 10,000 औटर तथा 15 व्हेल मर गई थीं । मगर य़ह इराक द्वारा ख़ाड़ी य़ुद्ध में पम्प किए गए तेल तथा अमरीका द्वारा तेल टेंकरों पर की गई बमबारी से फैले तेल की मात्रा  के सामऩे बौऩा हैं । एक आकलऩ  के अऩुसार 110 लाख़ बैरल कच्च तेल फारस की ख़ाड़ी में प्रवेश कर गय़ा हैं तथा कई पक्षी किस्में विलुप्त हो गई हैं ।

प्रदूषण से माऩव पर भी प्रभाव पड़ता हैं । विश्व में 63 करोड़ से अधिक वाहऩों में पेट्रोलिय़म का उपय़ोग प्रदूषण का मुख़्य़ कारण हैं । विकसित देशों में प्रदूषण रोकऩे  के ऩिय़म होऩे  के बावज़ूद 150 लाख़ टऩ कार्बऩ मोऩोऑक्साइड, 10 लाख़ टऩ ऩाइट्रोज़ऩ ऑक्साइड तथा 15 लाख़ टऩ हाइड्रोकार्बऩ्स प्रति वर्ष वाय़ुमंडल में बढ़ ज़ाते हैं । ज़ीवाश्म ईंधऩ  के ज़लऩे से वाय़ुमंडल प्रति वर्ष करोड़ों टऩ कार्बऩ डाइऑक्साइड आती हैं । विकसित देश वाय़ुमंडल प्रदूषण  के लिय़े 70-प्रतिशत ज़िम्मेदार हैं । भारत प्रति वर्ष कुछ लाख़ टऩ सल्फर डाइड्रोकार्बऩ्स, कार्बऩ मोऩो ऑक्साइड, ऩाइट्रोज़ऩ ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बऩ्स वाय़ुमंडल में पहुँचाता हैं । इऩ प्रदूषकों से अऩेक बीमारिय़ाँ, ज़ैसे फेफड़े का कैंसर, दमा, ब्रोंकाइटिस, टी.बी. आदि हो ज़ाती हैं।

वाय़ुमंडल में विषैले रसाय़ऩों  के कारण कैंसर  के 80-प्रतिशत मामले होते हैं । मुम्बई में अऩेक लोग इऩ बीमारिय़ों से पीड़ित हैं । दिल्ली में फेफड़ों  के मरीज़ों की संख़्य़ा देश में सर्वाधिक हैं । इसकी 30-प्रतिशत आबादी इसका शिकार हैं । दिल्ली में सांस तथा गले की बीमारिय़ाँ 12 गुऩा अधिक हैं । इराक  के विरूद्ब 2003  के य़ुद्ध ऩे इराक तथा उस के आसपास  के क्षेत्र को बुरी तरह विषैला कर दिय़ा हैं ज़िससे पाऩी, हवा तथा मिट्टी बहुत प्रदूषित हुय़े तथा लोगों का ज़ीवऩ ख़तरे में पड़ गय़ा । इससे पहले 1991  के ख़ाड़ी य़ुद्ध ऩे संसार में पर्य़ावरण संतुलऩ को विऩाश में धकेल दिय़ा। वहाँ ज़ो माऩव तथा पर्य़ावरण की हाऩि हुई, वह संसार में हुय़े हिरोशिमा, भोपाल तथा चेरऩोबिल से मिलकर हुई बर्बादी से कम ऩहीं हैं ।

कुवैत  के तेल कुआं, पेट्रोल रिफाइऩरी  के ज़लऩे तथा तेल  के फैलऩे से कुवैत  के आसपास का विशाल क्षेत्र धूल, गैसों तथा अऩ्य़ विषैले पदार्थो से प्रदूषित हुआ हैं । इराक ज़हरीला रेगिस्ताऩ बऩ गय़ा हैं, ज़हाँ एक वॄहद क्षेत्र में महामारी फैली हैं । पेट्रोलिय़म अपशिष्ट ऩे समुद्री ख़ाद्य़ पदार्थो को भी बुरी तरह प्रभावित किय़ा हैं। प्रदूषित पाऩी से ओंस्टर (शेल फिश) कैंसरकारी हो ज़ाती हैं । समुद्री ख़ाद्य़ पदार्थो का मऩुष्य़ द्वारा उपय़ोग करऩे पर उऩमें होठों, ठोड़ी, गालों, उंगलिय़ों  के सिरों में सुऩ्ऩता, सुस्ती, चक्कर आऩा, बोलऩे में असंगति तथा ज़ठर आंत्रीय़ विकार होऩे लगते हैं । विश्व  के सामऩे अपऩे वाय़ुमंडल को बचाऩे की कड़ी चुऩौती ख़ड़ी हैं । सबक हैं कि पेट्रोलिय़म की भय़ंकर तबाही  के परिणामों  के मद्दे ऩज़र कम विकसित देशों को अपऩी औद्य़ोगिक प्रगति  के लिय़े अऩ्य़ सुरक्षित- ऊर्ज़ा स्त्रोत विकसित करऩे चाहिय़े ।

हम ‘पर्यावरण’ शब्द से परिचित हैं। इस शब्द का प्रयोग टेलीविजन पर, समाचार पत्रों में तथा हमारे आस-पास लोगों द्वारा प्राय: किया जाता है। हमारे बुजुर्ग हमसे कहते हैं कि अब वह पर्यावरण / वातावरण नहीं रहा जैसा कि पहले था, दूसरे कहते हैं हमें स्वस्थ पर्यावरण में काम करना चाहए। ‘पर्यावरणीय’ समस्याओं पर चर्चा के लिए विकसित एवं विकासशील देशों के वैश्विक सम्मेलन भी नियमित रूप से होते रहते हैं। इस आलेख में हम चर्चा करेंगे कि विभिन्न कारक पर्यावरण में किस प्रकार अन्योन्यक्रिया करते हैं तथा पर्यावरण पर क्या प्रभाव डालते हैं। हम जानते है  कि विभिन्न पदार्थों का चक्रण पर्यावरण में अलग-अलग जैव-भौगोलिक रासायनिक चक्रों में होता है। इन चक्रों में अनिवार्य पोषक जैसे नाइट्रोंजन, कार्बन, ऑक्सीजन एवं जल एक रूप से दूसरे रूप में बदलते हैं। अब हम जानेंगे कि मनुष्य की गतिविधियाँ इन चक्रों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।

क्या होता है जब हम अपने अपशिष्ट पर्यावरण में डालते हैं?

अपनी दैनिक गतिविधियों में हम बहुत से ऐसे पदार्थ उत्पादित करते हैं जिन्हें फेंकना पड़ता है। इनमें से अपशिष्ट पदार्थ क्या हैं? जब हम उन्हें फेंक देते हैं तो उनका क्या होता है?


हम  ‘जैव प्रक्रम’ के विषय में जानते है कि हमारे द्वारा खाए गए भोजन का पाचन विभिन्न एंजाइमों द्वारा किया जाता है। विचार कीजिये कि एक ही एंजाइम भोजन के सभी पदार्थों का पाचन क्यों नहीं करता? एंजाइम अपनी क्रिया में विशिष्ट होते हैं। किसी विशेष प्रकार के पदार्थ के पाचन/अपघटन के लिए विशिष्ट एंजाइम की आवश्यकता होती है। इसीलिए कोयला खाने से हमें ऊर्जा प्राप्त नहीं हो सकती। इसी कारण, बहुत से मानव-निर्मित पदार्थ जैसे कि प्लास्टिक का अपघटन जीवाणु अथवा दूसरे मृतजीवियों द्वारा नहीं हो सकता। इन पदार्थों पर भौतिक प्रक्रम जैसे कि ऊ…ष्मा तथा दाब का प्रभाव होता है, परंतु सामान्य अवस्था में लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं। वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटित हो जाते हैं, ‘जैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं। वे पदार्थ जो इस प्रक्रम में अपघटित नहीं होते ‘अजैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं। यह पदार्थ सामान्यत: अक्रिय हैं तथा लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं अथवा पर्यावरण के अन्य सदस्यों को हानि पहुँचाते हैं।

पारितंत्र और इसके संघटक

सभी जीव जैसे कि पौधो, जंतु, सूक्ष्मजीव एवं मानव तथा भौतिक कारकों में परस्पर अन्योन्यक्रिया होती है तथा प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं। किसी क्षेत्र के सभी जीव तथा वातावरण के अजैव कारक संयुक्त रूप से पारितंत्र बनाते हैं। अत: एक पारितंत्र में सभी जीवों के जैव घटक तथा अजैव घटक होते हैं। भौतिक कारक जैसे- ताप, वर्षा, वायु, मृदा एवं खनिज इत्यादि अजैव घटक हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप बगीचे में जाएँ तो आपको विभिन्न पौधो जैसे- घास, वृक्ष, गुलाब, चमेली, सूर्यमुखी जैसे फूल वाले सजावटी पौधो तथा मेंढ़क, कीट एवं पक्षी जैसे जंतु दिखाई देंगे। यह सभी सजीव परस्पर अन्योन्यक्रिया करते हैं तथा इनकी वृद्धि, जनन एवं अन्य क्रियाकलाप पारितंत्र के अजैव घटकों द्वारा प्रभावित होते हैं। अत: एक बगीचा एक पारितंत्र है। वन, तालाब तथा झील पारितंत्र के अन्य प्रकार हैं। ये प्राकृतिक पारितंत्र हैं, जबकि बगीचा तथा खेत मानव निर्मित ; कृत्रिम पारितंत्र हैं।

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हम जानते हैं कि जीवन निर्वाह के आधार जीवों को उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक वर्गों में बाँटा गया है।  कौन-से जीव सूर्य के प्रकाश एवं क्लोरोफ़िल की उपस्थिति में अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक पदार्थ जैसे कि, शर्करा ;चीनी एवं मंड का निर्माण कर सकते हैं? सभी हरे पौधो एवं नील-हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है, इसी वर्ग में आते हैं तथा उत्पादक कहलाते हैं। सभी जीव प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अपने निर्वाह हेतु उत्पादकों पर निर्भर करते हैं? ये जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं। उपभोक्ता को मुख्यत: शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी एवं परजीवी में बाँटा गया है।

ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जब आप जल जीवशाला को साफ करना छोड़ दें तथा कुछ मछलियाँ एवं पौधो इसमें मर भी गए हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि क्या होता है जब एक जीव मरता है? जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव मृतजैव अवशेषों का अपमार्जन करते हैं। ये सूक्ष्मजीव अपमार्जक हैं क्योंकि य जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं जो मिट्‌टी ;भूमि में चले जाते हैं तथा पौधों द्वारा पुन: उपयोग में लाए जाते हैं। इनकी अनुपस्थिति में मृत जंतुओं एवं पौधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या अपमार्जकों के न रहने पर भी मृदा की प्राकृतिक पुन:पूर्ति होती रहती हैं?

आहार श्रॄंखला एवं जाल

जीवों की एक श्रॄंखला जो एक-दूसरे का आहार करते हैं। विभिन्न जैविक स्तरों पर भाग लेने वाले जीवों की यह श्रॄंखला  आहार श्रॄंखला का निर्माण करती हैं। आहार श्रॄंखला का प्रत्येक चरण अथवा कड़ी एक पोषी स्तर बनाते हैं। स्वपोषी अथवा उत्पादक प्रथम पोषी स्तर हैं तथा सौर ऊर्जा का स्थिरीकरण करके उसे विषमपोषियों अथवा उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध कराते हैं। शाकाहारी अथवा प्राथमिक उपभोक्ता द्वितीय पोषी स्तर छोटे मांसाहारी अथवा द्वितीय उपभोक्ता तीसरे पोषी स्तर तथा बड़े मांसाहारी अथवा तृतीय उपभोक्ता चौथे पोषी स्तर का निर्माण करते हैं।

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हम जानते हैं कि जो भोजन हम खाते हैं, हमारे लिए ऊर्जा स्रोत का कार्य करता है तथा विभिन्न कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। अत: पर्यावरण के विभिन्न घटकों की परस्पर अन्योन्यक्रिया में निकाय के एक घटक से दूसरे में ऊर्जा का प्रवाह होता है। जैसा कि हम पढ़ चुके हैं, स्वपोषी सौर प्रकाश में निहित ऊर्जा को ग्रहण करके रासायनिक ऊर्जा में बदल देते हैं। यह ऊर्जा संसार के संपूर्ण जैवसमुदाय की सभी क्रियाओं के संपादन में सहायक है। स्वपोषी से ऊर्जा विषमपोषी एवं अपघटकों तक जाती है जैसा कि ‘ऊर्जा के स्रोत’ नामक पिछले आलेख में हमने जाना था कि जब ऊर्जा का एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन होता है, तो पर्यावरण में ऊर्जा की कुछ मात्रा का अनुपयोगी ऊर्जा के रूप में ह्रास हो जाता है। पर्यावरण के विभिन्न घटकों के बीच ऊर्जा के प्रवाह का विस्तृत अध्ययन किया गया तथा यह पाया गया कि: एक स्थलीय पारितंत्र में हरे पौधो की पत्तयों द्वारा प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा का लगभग 1% भाग खाद्य ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। जब हरे पौधो प्राथमिक उपभोक्ता द्वारा खाए जाते हैं, ऊर्जा की बड़ी मात्रा का पर्यावरण में ई…ष्मा के रूप में ह्रास होता है, कुछ मात्रा का उपयोग पाचन, विभिन्न जैव कार्यों में, वृद्धि एवं जनन में होता है। खाए हुए भोजन की मात्रा का लगभग 10% ही जैव मात्रा में बदल पाता है तथा अगले स्तर के उपभोक्ता को उपलब्ध हो पाता है।  अत: हम कह सकते हैं प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध कार्बनिक पदार्थों की मात्रा का औसतन 10% ही उपभोक्ता के अगले स्तर तक पहुँचता है।  क्योंकि उपभोक्ता के अगले स्तर के लिए ऊर्जा की बहुत कम मात्रा उपलब्ध हो पाती है, अत: आहार श्रॄंखला सामान्यत: तीन अथवा चार चरण की होती है। प्रत्येक चरण पर ऊर्जा का ह्रास इतना अधिक होता है कि चौथे पोषी स्तर के बाद उपयोगी ऊर्जा की मात्रा बहुत कम हो जाती है।

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 सामान्यत: निचले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या अधिक होती है, अत: उत्पादक स्तर पर यह संख्या सर्वाधिक होती है।  विभिन्न आहार श्रॄंखलाओं की लंबाई एवं जटिलता में काफी अंतर होता है। आमतौर पर प्रत्येक जीव दो अथवा अधिक प्रकार के जीवों द्वारा खाया जाता है, जो स्वयं अनेक प्रकार के जीवों का आहार बनते हैं। अत: एक सीधी आहार श्रॄंखला के बजाय जीवों के मध्य आहार संबंध शाखान्वित होते हैं तथा शाखान्वित श्रॄंखलाओं का एक जाल बनाते हैं जिससे ‘आहार जाल’ कहते हैं।

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ऊर्जा प्रवाह के चित्र से दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, ऊर्जा का प्रवाह एकदिशिक अथवा एक ही दिशा में होता है। स्वपोषी जीवों द्वारा ग्रहण की गई ऊर्जा पुन: सौर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं होती तथा शाकाहारियों को स्थानांतरित की गई ऊर्जा पुन: स्वपोषी जीवों को उपलब्ध नहीं होती है। जैसे यह विभिन्न पोषी स्तरों पर क्रमिक स्थानांतरित होती है अपने से पहले स्तर के लिए उपलब्ध नहीं होती। आहार श्रॄंखला का एक दूसरा आयाम यह भी है कि हमारी जानकारी के बिना ही कुछ हानिकारक रासायनिक पदार्थ आहार श्रॄंखला से होते हुए हमारे शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। आप कक्षा 9 में पढ़ चुके हैं कि जल प्रदूषण किस प्रकार होता है। इसका एक कारण है कि विभिन्न फसलों को रोग, एवं पीड़कों से बचाने के लिए पीड़कनाशक एवं रसायनों का अत्यधिक प्रयोग करना है ये रसायन बह कर मिट्‌टी में अथवा जल स्रोत में चले जाते हैं। मिट्‌टी से इन पदार्थों का पौधो द्वारा जल एवं खनिजों के साथ-साथ अवशोषण हो जाता है तथा जलाशयों से यह जलीय पौधो एवं जंतुओं में प्रवेश कर जाते हैं। यह केवल एक तरीका है जिससे वे आहार श्रॄंखला में प्रवेश करते हैं। क्योंकि ये पदार्थ अजैव निम्नीकृत हैं, यह प्रत्येक पोषी स्तर पर उतरोत्तर संग्रहित होते जाते हैं। क्योंकि किसी भी आहार श्रॄंखला में मनुष्य शीर्षस्थ है, अत: हमारे शरीर में यह रसायन सर्वाधिक मात्रा में संचित हो जाते हैं। इसे ‘जैव-आवधर्न कहते हैं। यही कारण है कि हमारे खाद्यान्न-गेहूँ तथा चावल, सब्जियाँ, फल तथा मांस में पीड़ क रसायन के अवशिष्ट विभिन्न मात्रा में उपस्थित होते हैं। उन्हें पानी से धोकर अथवा अन्य प्रकार से अलग नहीं किया जा सकता।

हमारे क्रियाकलाप और पर्यावरण

हम सब पर्यावरण का समेकित भाग हैं। पर्यावरण में परिवर्तन हमें प्रभावित करते हैं तथा हमारे क्रियाकलाप/गतिविधियाँ हमारे चारों ओर के पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। हम जानते हैं कि हमारे क्रियाकलाप पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। इस भाग में हम पर्यावरण संबंधी दो समस्याओं के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे, वे हैं- ओजोन परत का अपक्षय तथा अपशिष्ट निपटान।

ओजोन परत तथा अपक्षय

ओजोन के अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनते हैं जबकि सामान्य ऑक्सीजन जिसके विषय में हम प्राय: चर्चा करते हैं, के अणु में दो परमाणु होते हैं। जहाँ ऑक्सीजन सभी प्रकार के वायविक जीवों के लिए आवश्यक है, वहीं ओजोन एक घातक विष है। परंतु वायुमंडल के ऊ…परी स्तर में ओजोन एक आवश्यक प्रकार्य संपादित करती है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है। यह पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है।

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उदाहरणत:, यह गैस मानव में त्वचा का वैंफसर उत्पन्न करती हैं। वायुमंडल के उच्चतर स्तर पर पराबैंगनी विकिरण के प्रभाव से ऑक्सीजन अणुओं से ओजोन बनती है। उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन अणुओं को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन परमाणु बनाते हैं। ऑक्सीजन के ये स्वतंत्र परमाणु संयुक्त होकर ओजोन बनाते हैं जैसा कि समीकरण में दर्शाया गया है।

ओजोन

1980 से वायुमंडल में ओजोन की मात्रा में तीव्रता से गिरावट आने लगी। क्लोरो-फ़्लुओरो-कार्बन सीएफ़सी जैसे मानव संश्लेषित रसायनों को इसका मुख्य कारक माना गया। इनका उपयोग रेफ़्रिजेरेटर शीतलन एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है। 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यूएनईपी में सर्वानुमति बनी कि सीएफ़सी के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए।

कचरा प्रबंधन

किसी भी नगर एवं कस्बे में जाने पर चारों ओर कचरे के ढेर दिखाई देते हैं। किसी पर्यटन स्थल पर जाइए, हमें विश्वास है कि वहाँ पर बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों की खाली थैलियाँ इधर-उधर पैफली हुई दिख जाएँगी। पिछली कक्षाओं में हमने स्वयं द्वारा उत्पादित इस कचरे से निपटान के उपायों पर चर्चा की है। आइए, इस समस्या पर अधिक गंभीरता से ध्यान दें। हमारी जीवन शैली में सुधार के साथ उत्पादित कचरे की मात्रा भी बहुत अधिक बढ़ गई है। हमारी अभिवृत्त में परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। हम प्रयोज्य निवर्तनीय वस्तुओं का प्रयोग करने लगे हैं। पैकेजिंग के तरीकों में बदलाव से अजैव निम्नीकरणीय वस्तु के कचरे में पर्याप्त वृद्धि हुई है। आपके विचार में इन सबका हमारे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

आपने कभी सोचा है कि मिट्टी की उर्वरता, गठन व स्वरूप अलग क्यों है? आपने यह भी सोचा होगा कि अलग-अलग स्थानों पर चट्टानों के प्रकार भी भिन्न हैं। चट्टानें व मिट्टी आपस में संबंधत हैं क्योंकि असंगठित चट्टानें वास्तव में मिट्टियाँ ही हैं। पृथ्वी के धरातल पर चट्टानों व मिट्टियों में भिन्नता धरातलीय स्वरूप के अनुसार पाई जाती है। वर्तमान अनुमान के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 46 करोड़ वर्ष है। इतने लम्बे समय में अंतर्जात व बहिर्जात बलों से अनेक परिवर्तन हुए हैं। इन बलों की पृथ्वी की धरातलीय व अधस्तलीय आकृतियों की रूपरेखा निधार्रण में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  क्या आप जानते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले ‘इंडियन प्लेट’ भूमध्य रेखा से दक्षिण में स्थित थी। यह आकार में काफी विशाल थी और ‘आस्ट्रेलियन प्लेट’ इसी का हिस्सा थी। करोड़ों वर्षों के दौरान, यह प्लेट काफी हिस्सों में टूट गई और आस्ट्रेलियन प्लेट दक्षिण-पूर्व तथा इंडियन प्लेट उत्तर दिशा में खिसकने लगी।  इंडियन प्लेट का खिसकना अब भी जारी है और इसका भारतीय उपमहाद्वीप के भौतिक पर्यावरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव है।  क्या आप इंडियन प्लेट के उत्तर में खिसकने के परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं? भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान भूवैज्ञानिक संरचना व इसके क्रियाशील भूआकॄतिक प्रक्रम मुख्यत: अंतर्जनित व बहिर्जनिक बलों व प्लेट के क्षैतिज संचरण की अंत: क्रिया के परिणामस्वरुप अस्तित्व में आएँ हैं। भूवैज्ञानिक संरचना व शैल समूह की भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है जो भौतिक लक्षणों पर आधारित हैं।

क.- प्रायद्वीपीय खंड
ख.- हिमालय और अन्य अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वत मालाएँ
ग.- सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान

 

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प्रायद्वीपीय खंड

प्रायद्वीप खंड की उत्तरी सीमा कटी-फ़टी है, जो कच्छ से आरंभ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के समानांतर राजमहल की पहाड़ियों व गंगा डेल्टा तक जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पूर्व में कर्बी ऐंगलॉग ;ज्ञंतइप ।दहसवदह व मेघालय का पठार तथा पश्चिम में राजस्थान भी इसी खंड के विस्तार हैं। पश्चिम बंगाल में मालदा भ्रंश उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित मेघालय व कर्बी ऐंगलॉग पठार को छोटा नागपुर पठार से अलग करता है। राजस्थान में यह प्रायद्वीपीय खंड मरुस्थल व मरुस्थल सदृश्य स्थलाकॄतियों से ढका हुआ है। प्रायद्वीप मुख्यत: प्राचीन नाइस व ग्रेनाईट से बना है। केम्ब्रियन कल्प से यह भूखंड एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है। अपवाद स्वरूप पश्चिमी तट समुद्र में डूबा होने और कुछ हिस्से विवर्तनिक क्रियाओं से परिवर्तित होने के उपरान्त भी इस भूखंड के वास्तविक आधार तल पर प्रभाव नहीं पड़ता है। इंडो-आस्ट्रेलियन प्लेट का हिस्सा होने के कारण यह उधर्वाधर हलचलों व खंड भ्रंश से प्रभावित है। नर्मदा, तापी और महानदी की रिफट घाटियाँ और सतपुड़ा ब्लॉक पर्वत इसके उदाहरण हैं। प्रायद्वीप में मुख्यत: अवशिष्ट पहाड़ियाँ शामिल हैं, जैसे – अरावली, नल्लामाला, जावादी, वेलीकोण्डा, पालकोण्डा श्रेणी और महेंद्रगिरी पहाड़ियाँ आदि। यहाँ की नदी घाटियाँ उथली और उनकी प्रवणता कम होती है। पूर्व की ओर बहने वाली अधिकांश नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले डेल्टा निर्माण करती हैं। महानदी, गोदावरी और कॄष्णा द्वारा निर्मित डेल्टा इसके उदाहरण हैं।

हिमालय और अन्य अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ

कठोर एवं स्थिर प्रायद्वीपीय खंड के विपरीत हिमालय और अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाओं की भूवैज्ञानिक संरचना तरूण, दुर्बल और लचीली है। ये पर्वत वर्तमान समय में भी बहिर्जनिक तथा अंतर्जनित बलों की अंत र्क्रियाओं से प्रभावित हैं। इसके परिणामस्वरूप इनमें वलन, भ्रंश और क्षेप ;जीतनेज बनते हैं। इन पर्वतों की उत्पत्ति विवर्तनिक हलचलों से जुड़ी हैं। तेज बहाव वाली नदियों से अपरदित ये पर्वत अभी भी युवा अवस्था में हैं। गॉर्ज, ट-आकार घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ व जल-प्रपात इत्यादि इसका प्रमाण हैं।

सिंधु-गंगा-बह्मपुत्र मैदान

भारत का तृतीय भूवैज्ञानिक खंड सिंधु, गंगा और बह्मपुत्र नदियों का मैदान है। मूलत: यह एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 6-4 करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब से इसे हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है। ऊपरलिखित वृतांत से पता चलता है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की भूवैज्ञानिक संरचना में महत्वपूर्ण अंतर है। इसके कारण दूसरे पक्षों जैसे धरातल और भूआकृति पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।

भूआकृति

किसी स्थान की भूआकॄति, उसकी संरचना, प्रक्रिया और विकास की अवस्था का परिणाम है। भारत में धरातलीय विभिन्नताएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसके उत्तर में एक बड़े क्षेत्र में ऊ…बड़-खाबड़ स्थलाकॄति है। इसमें हिमालय पर्वत श्रंखलाएँ हैं, जिसमें अनेकों चोटियाँ, सुंदर घाटियाँ व महाखड्‌ड हैं। दक्षिण भारत एक स्थिर परंतु कटा-फटा पठार है जहाँ अपरदित चट्टान खंड और कगारों की भरमार है। इन दोनों के बीच उत्तर भारत का विशाल मैदान है। मोटे तौर पर भारत को निम्नलिखित भूआकॄतिक खंडों में बाँटा जा सकता है।

१- उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला
२- उत्तरी भारत का मैदान
३- प्रायद्वीपीय पठार
४- भारतीय मरुस्थल
५- तटीय मैदान
६- द्वीप समूह

उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला

उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला में हिमालय पर्वत और उत्तरी-पूर्वी पहाड़ियाँ शामिल हैं। हिमालय में कई समानांतर श्रंखलाएँ है जिसमें बहृत हिमालय, पार हिमालय श्रंखलाएँ, मध्य हिमालय और शिवालिक प्रमुख श्रेणियाँ हैं। भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में हिमालय की ये श्रेणियाँ उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर फैली हैं। दार्जलिंग और सिक्किम क्षेत्रों में ये श्रेणियाँ पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश में ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पश्चिम की ओर घूम जाती हैं। मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर में ये पहाड़ियाँ उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली हैं।

बृहत हिमालय श्रंखला, जिसे केंद्रीय अक्षीय श्रेणी भी कहा जाता है, की पूर्व-पश्चिम लंबाई लगभग 2,500 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 160 से 400 किलोमीटर है। जैसाकि मानचित्र से स्पष्ट है हिमालय, भारतीय उपमहाद्वीप तथा मध्य एवं पूर्वी एशिया के देशों के बीच एक मजबूत लंबी दीवार के रूप में खड़ा है। हिमालय पर्वतमाला में भी अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताएँ हैं। उच्चावच, पर्वत श्रेणियों के सरेखण और दूसरी भूआकॄतियों के आधार पर हिमालय को निम्नलिखित उपखंडों में विभाजित किया जा सकता है।

१- कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय
२- हिमाचल और उत्तरांचल हिमालय
३- दा र्जलिंग और सिक्किम हिमालय
४- अरुणाचल हिमालय
५- पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत

कश्मीर हिमालय में अनेक पर्वत श्रेणियाँ हैं, जैसे – कराकोरम, लद्दाख, जास्कर और पीरपंजाल। कश्मीर हिमालय का उत्तरी-पूर्वी भाग, जो बृहत हिमालय और कराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है, एक ठंडा मरुस्थल है। बृहत हिमालय और पीरपंजाल के बीच विश्व प्रसिद्ध कश्मीर घाटी और डल झील हैं। दक्षिण एशिया की महत्वपूर्ण हिमानी नदियाँ बलटोरो और सियाचिन इसी प्रदेश में हैं। कश्मीर हिमालय करेवा  के लिए भी प्रसिद्ध है, जहाँ जाफरान की खेती की जाती है। बृहत हिमालय में जोजीला, पीर पंजाल में बानिहाल, जास्कर श्रेणी में फोटुला और लद्दाख श्रेणी में खदुर्गंला जैसे महत्वपूर्ण दर्रे स्थित हैं। महत्वपूर्ण अलवणजल की झीलें, जैसे- डल और वुलर तथा लवणजल झीलें, जैसे- पाँगाँग सो  और सोमुरीरी भी इसी क्षेत्र में पाई जाती हैं। सिंधु तथा इसकी सहायक नदियाँ, झेलम और चेनाब, इस क्षेत्र को अपवाहित करती हैं। कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी हिमालय विलक्षण सौंदर्य और खूबसूरत दृश्य स्थलों के लिए जाना जाता है। हिमालय की यही रोमांचक दृश्यावली पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कुछ प्रसिद्ध तीर्थस्थान, जैसे-
वैष्णो देवी, अमरनाथ गुफा और चरार-ए-शरीफ भी यहीं स्थित है। यहाँ बहुत-से तीर्थ यात्री हर साल आते हैं।

जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर झेलम नदी के किनारे स्थित है। श्रीनगर में डल झील एक रोचक प्राकॄतिक स्थल है। कश्मीर घाटी में झेलम नदी युवा अवस्था में बहती है तथापि नदीय स्थल रूप के विकास में प्रौढ़ावस्था में निर्मित होने वाली विशिष्ट आकॄति-विसर्पो का निर्माण करती हैं । प्रदेश के दक्षिणी भाग में अनुदैधर्य  घाटियाँ पाई जाती है जिन्हें दून कहा जाता है। इनमें जम्मू-दून और पठानकोट-दून प्रमुख हैं।

हिमाचल और उत्तरांचल हिमालय

हिमालय का यह हिस्सा पश्चिम में रावी नदी और पूर्व में काली ;घाघरा की सहायक नदी के बीच स्थित है। यह भारत की दो मुख्य नदी तंत्रों, सिंधु और गंगा द्वारा अपवाहित है। इस प्रदेश के अंदर बहने वाली नदियाँ रावी, ब्यास और सतलुज ;सिंधु की सहायक नदियाँ और यमुना और घाघरा ;गंगा की सहायक नदियाँ हैं। हिमाचल हिमालय का सुदूर उत्तरी भाग लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का विस्तार है और लाहौल एवं स्पिति जिले के स्पिति उपमंडल में है। हिमालय की तीनों मुख्य पर्वत श्रंखलाएँ, बृहत हिमालय, लघु हिमालय ;जिन्हें हिमाचल में धौलाधर और उत्तरांचल में नागतीभा कहा जाता है और उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली शिवालिक श्रेणी, इस हिमालय खंड में स्थित हैं। लघु हिमालय में 1000 से 2000 मीटर ऊँचाई वाले पर्वत ब्रिटिश प्रशासन के लिए मुख्य आकर्षण केंद्र रहे हैं। कुछ महत्वपूर्ण पर्वत नगर, जैसे – धर्मशाला, मसूरी, कासौली, अलमोड़ा, लैंसडाउन और रानीखेत इसी क्षेत्र में स्थित हैं।

इस क्षेत्र की दो महत्वपूर्ण स्थलाकॄतियाँ शिवालिक और दून हैं। यहाँ स्थित कुछ महत्वपूर्ण दून, चंडीगढ़-कालका का दून, नालागढ़ दून, देहरादून, हरीके दून तथा कोटा दून शामिल हैं। इनमें देहरादून सबसे बड़ी घाटी है, जिसकी लंबाई 35 से 45 किलोमीटर और चौड़ाई 22 से 25 किलोमीटर है। बृहत हिमालय की घाटियों में भोटिया प्रजाति के लोग रहते हैं। ये खानाबदोश लोग हैं जो ग्रीष्म ॠतु में बुगयाल ;ऊँचाई पर स्थित घास के मैदान में चले जाते हैं और शरद ॠतु में घाटियों में लौट आते हैं। प्रसिद्ध ‘फ़ूलों की घाटी’ भी इसी पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब भी इसी इलाके में स्थित हैं। इस क्षेत्र में पाँच प्रसिद्ध प्रयाग ;नदी संगम हैं।

दार्जलिंग और सिक्किम हिमालय

इसके पश्चिम में नेपाल हिमालय और पूर्व में भूटान हिमालय है। यह एक छोटा परंतु हिमालय का बहुत महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ तेज बहाव वाली तिस्ता नदी बहती है और कंचनजंगा जैसी ऊँची चोटियाँ और गहरी घाटियाँ पाई जाती हैं। इन पर्वतों के ई…ँचे शिखरों पर लेपचा जनजाति और दक्षिणी भाग ;विशेषकर दार्जलिंग हिमालय में मिश्रित जनसंख्या, जिसमें नेपाली, बंगाली और मध्य भारत की जन-जातियाँ शामिल हैं, पाई जाती है। यहाँ की प्राकॄतिक दशाओं, जैसे – मध्यम ढाल, गहरी व जीवाश्मयुक्त मिट्टी, संपूर्ण वर्ष वर्षा का होना और मंद शीत ॠतु का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने यहाँ चाय के बागान लगाए। बाकी हिमालय से यह क्षेत्र भिन्न है क्योंकि यहाँ दुआर स्थलाकॄतियाँ पाई जाती हैं जिनका उपयोग चाय बागान लगाने के लिए किया गया है। सिक्किम और दार्जलिंग हिमालय अपने रमणीय सौंदर्य, वनस्पति जात और प्राणी जात और आर्कड के लिए जाना जाता है।

अरुणाचल हिमालय

यह पर्वत क्षेत्र भूटान हिमालय से लेकर पूर्व में डिपूफ दर्रे तक फैला है। इस पर्वत श्रेणी की सामान्य दिशा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पूर्व है। इस क्षेत्र की मुख्य चोटियों में काँगतु और नमचा बरवा शामिल है। ये पर्वत श्रेणियाँ उत्तर से दक्षिण दिशा में तेज बहती हुई और गहरे गॉर्ज बनाने वाली नदियों द्वारा विच्छेदित होती हैं। नामचा बरुआ को पार करने के बाद बह्मपुत्र नदी एक गहरी गॉर्ज बनाती है। कामेंग, सुबनसरी, दिहांग, दिबाँग और लोहित यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। ये बारहमासी नदियाँ हैं और बहुत से जल-प्रपात बनाती हैं। इसलिए, यहाँ जल विद्युत उत्पादन की क्षमता काफी है। अरुणाचल हिमालय की एक मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ बहुत-सी जनजातियाँ निवास करती हैं। इस क्षेत्र में पश्चिम से पूर्व में बसी कुछ जनजातियाँ इस प्रकार हैं मोनपा, त्रिफला, अबोर, मिशमी, निशी और नागा। इनमें से ज्यादातर जनजातियाँ झूम खेती करती हैं, जिसे स्थानांतरी कॄषि या स्लैश और बर्न कॄषि भी कहा जाता है। यह क्षेत्र जैव विविधता में धनी है जिसका संरक्षण देशज समुदायों ने किया। ऊबड़-खाबड़ स्थलाकॄति के कारण यहाँ पर विभिन्न घाटियों के बीच परिवहन जुड़ाव लगभग नाम मात्र ही है। इसलिए, अरुणाचल-असम सीमा पर स्थित दुआर क्षेत्र से होकर ही यहाँ कारोबार किया जा सकता है।

पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत

हिमालय पर्वत के इस भाग में पहाड़ियों की दिशा उत्तर से दक्षिण है। ये पहाड़ियाँ विभिन्न स्थानीय नामों से जानी जाती है। उत्तर में ये पटकाई बूम, नागा पहाड़ियाँ, मणिपुर पहाड़ियाँ और दक्षिण में मिजो या लुसाई पहाड़ियों के नाम से जानी जाती हैं। यह एक नीची पहाड़ियों का क्षेत्र है जहाँ अनेक जनजातियाँ ‘झूम’ या स्थानांतरी खेती करती है। यहाँ ज्यादातर पहाड़ियाँ, छोटे-बड़े नदी-नालों द्वारा अलग होती हैं। बराक मणिपुर और मिजोरम की एक मुख्य नदी है। मणिपुर घाटी के मध्य एक झील स्थित है जिसे ‘लोकताक’ झील कहा जाता है और यह चारों ओर से पहाड़ियों से घिरी है। मिजोरम जिसे ‘मोलेसिस बेसिन’ भी कहा जाता है मृदुल और असंगठित चट्टानों से बना है। नागालैंड में बहने वाली ज्यादातर नदियाँ बह्मपुत्र नदी की सहायक नदियाँ हैं। मिजोरम और मणिपुर की दो नदियाँ बराक नदी की सहायक नदियाँ हैं, जो मेघना नदी की एक सहायक नदी है। मणिपुर के पूर्वी भाग में बहने वाली नदियाँ चिंदविन नदी की सहायक नदियाँ है जो कि म्यांमार में बहने वाली इरावदी नदी की एक सहायक नदी है।

उत्तरी भारत का मैदान

उत्तरी भारत का मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहाकर लाए गए जलोढ़ निक्षेप से बना है। इस मैदान की पूर्व से पश्चिम लंबाई लगभग 3200 किलो मीटर है। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर है। जलोढ़ निक्षेप की अधकतम गहराई 1000 से 2000 मीटर है। उत्तर से दक्षिण दिशा में इन मैदानों को तीन भागों में बाँट सकते हैं भाभर, तराई और जलोढ़ मैदान। जलोढ़ मैदान को आगे दो भागों में बाँटा जाता है- खादर और बाँगर।

भाभर 8 से 10 किलोमीटर चौड़ाई की पतली पट्टी है जो शिवालिक गिरिपाद के समानांतर फैली हुई है। उसके परिणामस्वरूप हिमालय पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलती नदियाँ यहाँ पर भारी जल-भार, जैसे- बड़े शैल और गोलाश्म जमा कर देती हैं और कभी-कभी स्वयं इसी में लुप्त हो जाती हैं। भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर है। भाभर क्षेत्र में लुप्त नदियाँ इस प्रदेश में ध्रातल पर निकल कर प्रकट होती हैं और क्योंकि इनकी निश्चित वाहिकाएँ नहीं होती, ये क्षेत्र अनूप बन जाता है, जिसे तराई कहते हैं। यह क्षेत्र प्राकॄतिक वनस्पति से ढका रहता है और विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणियों का घर है। तराई से दक्षिण में मैदान है जो पुराने और नए जलोढ़ से बना होने के कारण बाँगर और खादर कहलाता है।

इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित नदियाँ पाई जाती हैं। ब्रह्मपुत्र घाटी का मैदान नदीय द्वीप और बालू-रोधकाओं की उपस्थिति के लिए जाना जाता है। यहाँ ज्यादातर क्षेत्र में समय पर बाढ़ आती रहती है और नदियाँ अपना रास्ता बदल कर गुंफित वाहिकाएँ बनाती रहती हैं। उत्तर भारत के मैदान में बहने वाली विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर विश्व के बड़े-बड़े डेल्टाओं का निर्माण करती हैं, जैसे- सुंदर वन डेल्टा। सामान्य तौर पर यह एक सपाट मैदान है जिसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 50 से 100 मीटर है। हरियाणा और दिल्ली राज्य सिंधु और गंगा नदी तंत्रों के बीच जल-विभाजक है। ब्रह्मपुत्र नदी अपनी घाटी में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है। परंतु बांग्लादेश में प्रवेश करने से पहले धुबरी के समीप यह नदी दक्षिण की ओर 90° मुड़ जाती है। ये मैदान उपजाई… जलोढ़ मिट्टी से बने हैं। जहाँ कई प्रकार की फसलें, जैसे-गेहूँ, चावल, गन्ना और जूट उगाई जाती हैं। अत: यहाँ जनसंख्या का घनत्व ज्यादा है।

प्रायद्वीपीय पठार

नदियों के मैदान से 150 मीटर ऊँचाई से ई…पर उठता हुआ प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है, जिसकी ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। उत्तर पश्चिम में दिल्ली, कटक अरावली विस्तार, पूर्व में राजमहल पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में इलायची ; कार्डामम पहाड़ियाँ, प्रायद्वीप पठार की सीमाएँ निधार्रित करती हैं। उत्तर-पूर्व में शिलांग तथा कार्बी-ऐंगलोंग पठार भी इसी भूखंड का विस्तार है। प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों से मिलकर बना है, जैसे- हजारीबाग पठार, पालायु पठार, रांची पठार, मालवा पठार, कोयेम्बटूर पठार और कर्नाटक पठार। यह भारत के प्राचीनतम और स्थिर भूभागों में से एक है। सामान्य तौर पर प्रायद्वीप की ऊँचाई पश्चिम से पूर्व को कम होती चली जाती है, जिसका प्रमाण यहाँ की नदियों के बहाव की दिशा से भी मिलता है। प्रायद्वीप पठार की कुछ नदियों के नाम बताएँ जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में गिरती हैं। इस क्षेत्र की मुख्य प्राकॄतिक स्थलाकॄतियों में टॉर, ब्लॉक पर्वत, भ्रंश घाटियाँ, पर्वत स्कंध, नग्न चट्टान संरचना, टेकरी पहाड़ी श्रंखलाएँ और क्वार्ट्‌जाइट भित्तियाँ  शामिल हैं जो प्राकॄतिक जल संग्रह के स्थल हैं। इस पठार के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में मुख्य रूप से काली मिट्टी पाई जाती है।

प्रायद्वीपीय पठार के अनेक हिस्से भू-उत्थान व निमज्जन, भ्रंश तथा विभंग निर्माण प्रक्रिया के अनेक पुनरावर्ती दौर से गुजरे हैं ;भीमा भ्रंश का उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि वहाँ बार-बार भूकंपीय हलचलें होती रहतीं हैं अपनी पुनरावर्ती भूकंपीय क्रियाओं की क्षेत्रीय विभिन्नता के कारण ही प्रायद्वीपीय पठार पर धरातलीय विविधताएँ पाई जाती हैं। इस पठार के उत्तरी-पश्चिमी भाग में नदी खड्ड और महाखड्ड इसके धरातल को जटिल बनाते हैं। चंबल, भिंड और मोरेना खड्ड इसके उदाहरण हैं। मुख्य उच्चावच लक्षणों के अनुसार प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।

१- दक्कन का पठार
२- मध्य उच्च भूभाग
३- उत्तरी-पूर्वी पठार

दक्कन का पठार

इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट, पूर्व में पूर्वी घाट और उत्तर में सतपुड़ा, मैकाल और महादेव पहाड़ियाँ हैं। पश्चिमी घाट को स्थानीय तौर पर अनेक नाम दिए गए हैं, जैसे महाराष्ट्र में सहयाद्रि, कर्नाटक और तमिलनाडु में नीलगिरि और केरल में अनामलाई और इलायची ;कार्डामम पहाड़ियाँ। पूर्वी घाट की तुलना में पश्चिमी घाट ऊँचे और अविरत हैं। इनकी औसत ऊँचाई लगभग 1500 मीटर है, जो कि उत्तर से दक्षिण की तरफ बढ़ती चली जाती है। प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊंची चोटी अनाईमुडी ;2695 मीटर है, जो पश्चिमी घाट की अनामलाई पहाड़ियों में स्थित है। दूसरी सबसे ऊंची चोटी डोडाबेटा है और यह नीलगिरी पहाड़ियों में है। ज्यादातर प्रायद्वीपीय नदियों की उत्पत्ति पश्चिमी घाट से है। पूर्वी घाट अविरत नहीं है और महानदी, गोदावरी, कॄष्णा और कावेरी नदियों द्वारा अपरदित हैं। यहाँ की कुछ मुख्य श्रेणियाँ जावादी पहाड़ियाँ, पालकोण्डा श्रेणी, नल्लामाला पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरि पहाड़ियाँ हैं। पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरी पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।

मध्य उच्च भूभाग

पश्चिम में अरावली पर्वत इसकी सीमा बनाते हैं। इसके दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत उच्छिष्ट पठार की श्रेणियों से बना हैं जिनकी समुद्रतल से ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। ये दक्कन पठार की उत्तरी सीमा बनाते हैं। ये अवशिष्ट पर्वतों के उत्कॄष्ट उदाहरण हैं, जो कि काफी हद तक अपरदित हैं और इनकी श्रंखला टूटी हुई है। प्रायद्वीपीय पठार के इस भाग का विस्तार जैसलमेर तक है जहाँ यह अनुदैधर्य रेत के टिब्बों और चापाकार ;बरखान रेतीले टिब्बो से ढके हैं। अपने भूगर्भीय इतिहास में यह क्षेत्र कायांतरित प्रक्रियाओं से गुजर चुका है और कायांतरित चट्टानों, जैस-संगमरमर, स्लेट और नाइस की उपस्थिति इसका प्रमाण है। समुद्र तल से मध्य उच्च भूभाग की ऊँचाई 700 से 1000 मीटर के बीच है और उत्तर तथा उत्तर-पूर्व दिशा में इसकी ऊँचाई कम होती चली जाती है। यमुना की अधिकतर सहायक नदियाँ विंध्याचल और केमूर श्रेणियों से निकलती हैं। बनास, चंबल की एकमात्र मुख्य सहायक नदी है, जो पश्चिम में अरावली से निकलती है। मध्य उच्च भूभाग का पूर्वी विस्तार राजमहल की पहाड़ियों तक है जिसके दक्षिण में स्थित छोटा नागपुर पठार खनिज पदार्थो का भंडार है।

उत्तर-पूर्व पठार

वास्तव में यह प्रायद्वीपीय पठार का ही एक विस्तारित भाग है। यह माना जाता है कि हिमालय उत्पत्ति के समय इंडियन प्लेट के उत्तर-पूर्व दिशा में खिसकने के कारण, राजमहल पहाड़ियों और मेघालय के पठार के बीच भ्रंश घाटी बनने से यह अलग हो गया था। बाद में यह नदी द्वारा जमा किए जलोढ़ द्वारा पाट दिया गया। आज मेघालय और कार्बी ऐंगलोंग पठार इसी कारण से मुख्य प्रायद्वीपीय पठार से अलग-थलग हैं। इसमें आवास करने वाली जनजातियों के नाम के आधार पर मेघालय के पठार को तीन भागों में बाँटा गया है १- गारो पहाड़ियाँ ;२- खासी पहाड़ियाँ ;३- जयंतिया पहाड़ियाँ। असम की कार्बी ऐंगलोंग पहाड़ियाँ भी इसी का विस्तार है। छोटा नागपुर के पठार की तरह मेघालय के पठार भी कोयला, लोहा, सिलीमेनाइट, चूने के पत्थर और यूरेनियम जैसे खनिज पदार्थो का भंडार है। इस क्षेत्र में अधकतर वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून से होती है। परिणामस्वरूप, मेघालय का पठार एक अति अपरदित भूतल है। चेरापूंजी नग्न चट्टानों से ढका स्थल है और यहाँ वनस्पति लगभग नहीं के बराबर है।

भारतीय मरुस्थल

विशाल भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह एक ऊ…बड़-खाबड़ भूतल है जिस पर बहुत से अनुदैधर्य रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं। यहाँ पर वार्षिक वर्षा 150 मिलीमीटर से कम होती है और परिणामस्वरूप यह एक शुष्क और वनस्पति रहित क्षेत्र है। इन्ही स्थलाकॄतिक गुणों के कारण इसे ‘मरुस्थली’ के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है कि मेसोजोइक काल में यह क्षेत्र समुद्र का हिस्सा था। इसकी पुष्टि आकल में स्थित काष्ठ जीवाश्म पार्क में उपलब्ध प्रमाणों तथा जैसलमेर के निकट ब्रह्मसर के आस-पास के समुद्री निक्षेपों से होती है ;काष्ठ जीवाश्म की आयु लगभग 18 करोड़ वर्ष आँकी गई है। यद्यपि इस क्षेत्र की भूगर्भिक चट्‌टान संरचना प्रायद्वीपीय पठार का विस्तार है, तथापि अत्यंत शुष्क दशाओं के कारण इसकी धरातलीय आकॄतियाँ भौतिक अपक्षय और पवन क्रिया द्वारा निर्मित हैं। यहाँ की प्रमुख स्थलाकॄतियाँ स्थानांतरी रेतीले टीले, छत्रक चट्टानें और मरुउद्यान ;दक्षिणी भाग में हैं। ढाल के आधार पर मरुस्थल को दो भागों में बाँटा जा सकता है- सिंध की ओर ढाल वाला उत्तरी भाग और कच्छ के रन की ओर ढाल वाला दक्षिणी भाग। यहाँ की अधकतर नदियाँ अल्पकालिक हैं। मरुस्थल के दक्षिणी भाग में बहने वाली लूनी नदी महत्वपूर्ण है। अल्प वृष्टि और बहुत अधक वाष्पीकरण की वजह से इस प्रदेश में हमेशा जल का घाटा रहता है। कुछ नदियाँ तो थोड़ी दूरी तय करने के बाद ही मरुस्थल में लुप्त हो जाती हैं। यह अंत: स्थलीय अपवाह का उदाहरण है जहाँ नदियाँ झील या प्लाया में मिल जाती हैं। इन प्लाया झीलों का जल खारा होता है जिससे नमक बनाया जाता है।

तटीय मैदान

भारत की तट रेखा बहुत लंबी है। स्थिति और सई˜य भूआकॄतिक प्रक्रियाओं के आधार पर तटीय मैदानों को दो भागों में बाँटा जा सकता है–
१- पश्चिमी तटीय मैदान
२- पूर्वी तटीय मैदान।

पश्चिमी तटीय मैदान जलमग्न तटीय मैदानों के उदाहरण हैं। ऐसा विश्वास है कि पौराणिक शहर द्वारका, जो किसी समय पश्चिमी तट पर मुख्य भूमि पर स्थित था, अब पानी में डूबा हुआ है। जलमग्न होने के कारण पश्चिमी तटीय मैदान एक संकीर्ण पट्टी मात्र है और पत्तनों एवं बंदरगाह विकास के लिए प्राकॄतिक परिस्थितियाँ प्रदान करता है। यहाँ पर स्थित प्राकॄतिक बंदरगाहों में कांडला, मजगाँव, जे एल एन नावहंशेवा, मर्मागाओ, मैंगलौर, कोचीन शामिल हैं। उत्तर में गुजरात तट से, दक्षिण में केरल तट तक फैले पश्चिमी तटीय मैदान को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है गुजरात का कच्छ और काठियावाड़ तट, महाराष्ट्र का कोंकण तट और गोवा तट, कर्नाटक तथा केरल के क्रमश: मालाबार तट। पश्चिमी तटीय मैदान मध्य में संकीर्ण है परंतु उत्तर और दक्षिण में चौड़े हो जाते हैं। इस तटीय मैदान में बहने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती हैं। मालाबार तट की विशेष स्थलाकॄति ‘कयाल’ जिसे मछली पकड़ने और अंत:स्थलीय नौकायन के लिए प्रयोग किया जाता है और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। केरल में हर वर्ष प्रसिद्ध ‘नेहरू ट्राफी वलामकाली’ ;नौका दौड़ का आयोजन ‘पुन्नामदा कयाल’ में किया जाता है।

पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में पूर्वी तटीय मैदान चौड़ा है और उभरे हुए तट का उदाहरण है। पूर्व की ओर बहने वाली और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ यहाँ लम्बे-चौड़े डेल्टा बनाती हैं। इसमें महानदी, गोदावरी, कॄष्णा और कावेरी का डेल्टा शामिल है। उभरा तट होने के कारण यहाँ पत्तन और पोतश्रय कम हैं। यहाँ पर महाद्वीपीय शेल्फ की चौड़ाई 500 किलोमीटर है जिसके कारण यहाँ पत्तनों और पोताश्रयों का विकास मुश्किल है

द्वीप समूह

भारत में दो प्रमुख द्वीप समूह हैं- एक बंगाल की खाड़ी में और दूसरा अरब सागर में। बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं। ये द्वीप 6° उत्तर से 14°उत्तर और 92° पूर्व से 94° पूर्व के बीच स्थित हैं। रीची द्वीप समूह और लबरीन्थ द्वीप, यहाँ के दो प्रमुख द्वीप समूह हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार। ये द्वीप, समुद्र में जलमग्न पवर्तों का हिस्सा है। कुछ छोटे द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी से भी जुड़ी है। बैरन आइलैंड नामक भारत का एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी भी निकोबार द्वीपसमूह में स्थित है। यह द्वीप असंगठित कंकड़, पत्थरों और गोलाश्मों से बना हुआ है। इस द्वीप समूह की मुख्य पर्वत चोटियों में सैडल चोटी ;उत्तरी अंडमान – 738 मीटर,  माउंट डियोवोली ;मध्य अंडमान – 515 मीटर,  माउंट कोयोब ;दक्षिणी अंडमान – 460 मीटर और  माउंट थुईल्लर ;ग्रेट निकोबार – 642 मीटर शामिल हैं।

पश्चिमी तट के साथ कुछ प्रवाल निक्षेप तथा खूबसूरत पुलिन हैं। यहाँ स्थित द्वीपों पर संवहनी वर्षा होती है और भूमध्यरेखीय प्रकार की वनस्पति उगती है। अरब सागर के द्वीपों में लक्षद्वीप और मिनिकॉय शामिल हैं। ये द्वीप 80° उत्तर से 12° उत्तर और 71° पूर्व से 74° पूर्व के बीच बिखरे हुए हैं। ये केरल तट से 280 किलोमीटर से 480 किलोमीटर दूर स्थित है। पूरा द्वीप समूह प्रवाल निक्षेप से बना है। यहाँ 36 द्वीप हैं और इनमें से 11 पर मानव आवास है। मिनिकॉय सबसे बड़ा द्वीप है जिसका क्षेत्रफल 453 वर्ग किलोमीटर है। पूरा द्वीप समूह 11 डिग्री चैनल द्वारा दो भागों में बाँटा गया है, उत्तर में अमीनी द्वीप और दक्षिण में कनानोरे द्वीप। इस द्वीप समूह पर तूफान निर्मित पुलिन हैं जिस पर अबद्ध गुटिकाऐं, शिंगिल, गोलाश्मिकाऐं तथा गोलाश्म पूर्वी समुद्र तट पर पाए जाते हैं।

क्या आप सोचते हैं कि जो कुछ वर्तमान में है, ऐसा ही रहेगा या भविष्य कुछ पक्षों में अलग होने जा रहा है? कुछ निश्चितता के साथ यह कहा जा सकता है कि समाज जनांकिकीय परिवर्तन, जनसंख्या का भौगोलिक स्थानांतरण, प्रौद्योगिक उन्नति, पर्यावरणीय निम्नीकरण, और जल अभाव का साक्षी होगा। जल अभाव संभवत: इसकी बढ़ती हुई माँग, अति उपयोग तथा  प्रदूषण के कारण घटती आपूर्ति के आधार पर सबसे बड़ी चुनौती है। जल एक चक्रीय संसाधन है जो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत धरातल पानी से  आच्छादित है परंतु अलवणीय जल कुल जल का केवल लगभग 3 प्रतिशत ही है। वास्तव में अलवणीय जल का एक बहुत छोटा भाग ही मानव उपयोग के लिए उपलब्ध है। अलवणीय जल की उपलब्धिता स्थान और समय के अनुसार भिन्न-भिन्न है। इस दुर्लभ संसाधन के आवंटन और नियंत्रण पर तनाव और लड़ाई झगड़े, संप्रदायों, प्रदेशों और राज्यों के बीच विवाद का विषय बन गए हैं। विकास को सुनिश्चित करने के लिए जल का मूल्यांकन, कार्यक्षम उपयोग और संरक्षण आवश्यक हो गए हैं। इस आलेख में हम भारत में जल संसाधनों, इसके भौगोलिक वितरण, क्षेत्रीय उपयोग और इसके संरक्षण और प्रबंधन की विधियों पर चर्चा करेंगे।

भारत का जल संसाधन

भारत में विश्व के धरातलीय क्षेत्र का लगभग 2.45 प्रतिशत, जल संसाधनों का 4 प्रतिशत, जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत भाग पाया जाता है। देश में एक वर्ष में वर्षण से प्राप्त कुल जल की मात्रा लगभग 4,000 घन कि-मी- है। धरातलीय जल और पुन: पूर्तियोग भौम जल से 1,869 घन कि-मी- जल उपलब्ध है। इसमें से केवल 60 प्रतिशत जल का लाभदायक उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार देश में कुल उपयोगी जल संसाधन 1,122 घन कि-मी- है।

धरातलीय जल संसाधन

धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं — नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब। देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लंबाई 1-6 कि-मी- से अधिक है, को मिलाकर 10,360 नदियाँ हैं। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1,869 घन कि-मी- होने का अनुमान किया गया है। फिर भी स्थलाकॄतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन किमी- ;32÷ जल का ही उपयोग किया जा सकता है। नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है।

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आप जानते  हैं कि भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेद्रित है। भारत में कुछ नदियाँ, जैसे– गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकॄत अधिक होती है। ये नदियाँ यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती हैं जिनमें कुल धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे– गोदावरी, कॄष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी संभव नहीं हो सका है।

भौम जल संसाधन

देश में, कुल पुन: पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन लगभग 432 घन कि-मी- है। तालिका 6-1 दर्शाती है कि कुल पुन: पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन का लगभग 46 प्रतिशत गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में पाया जाता है। उत्तर-पश्चिमी प्रदेश और दक्षिणी भारत के कुछ भागों के नदी बेसिनों में भौम जल उपयोग अपेक्षाकॄत अधिक है। देश में राज्यवार संभावित भौम जल के उपयोग को चित्र  में दर्शाया गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग बहुत अधिक है। परंतु कुछ राज्य जैसे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, केरल आदि अपने भौम जल क्षमता का बहुत कम उपयोग करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा और महाराष्ट्र अपने भौम जल संसाधनों का मध्यम दर से उपयोग कर रहे हैं। यदि वर्तमान प्रवृत्त जारी रहती है तो जल के माँग की आपूर्ति करने की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति विकास के लिए हानिकारक होगी और सामाजिक उथल-पुथल और विघटन का कारण हो सकती है।

लैगून और पश्च जल

भारत की समुद्र तट रेखा विशाल है और कुछ राज्यों में समुद्र तट बहुत दंतुरित (indented) है। इसी कारण बहुत-सी लैगून और झीलें बन गई हैं। केरल, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में इन लैगूनों और झीलों में बड़े धरातलीय जल संसाधन हैं। यद्यपि, सामान्यत: इन जलाशयों में खारा जल है, इसका उपयोग मछली पालन और चावल की कुछ निश्चित किस्मों, नारियल आदि की सिंचाई में किया जाता है।

जल की माँग और उपयोग

पारंपरिक रूप से भारत एक कॄषि प्रधान अर्थव्यवस्था है और इसकी जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग कॄषि पर निर्भर है। इसीलिए, पंचवर्षीय योजनाओं में, कॄषि उत्पादन को बढ़ाने के  लिए सिंचाई के विकास को एक अति उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है और बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जैसे– भाखड़ा नांगल, हीराकुड, दामोदर घाटी, नागार्जुन सागर, इंदिरा गांधी नहर परियोजना आदि शुरू की गई हैं। वास्तव में, भारत की वर्तमान में जल की माँग, सिंचाई की आवश्यकताओं के लिए अधिक है। धरातलीय और भौम जल का सबसे अधिक उपयोग कॄषि में होता है। इसमें धरातलीय जल का 89 प्रतिशत और भौम जल का 92 प्रतिशत जल उपयोग किया जाता है। जबकि औद्योगिक सेक्टर में, सतह जल का केवल 2 प्रतिशत और भौम जल का 5 प्रतिशत भाग ही उपयोग में लाया जाता है। घरेलू सेक्टर में धरातलीय जल का उपयोग भौम जल की तुलना में अधिक  है। कुल जल उपयोग में कॄषि सेक्टर का भाग दूसरे सेक्टरों से अधिक है। फिर भी, भविष्य में विकास के साथ-साथ देश में औद्योगिक और घरेलू सेक्टरों में जल का उपयोग बढ़ने की संभावना है।

सिंचाई के लिए जल की माँग

कॄषि में, जल का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई के लिए होता है। देश में वर्षा के स्थानिक-सामयिक परिवर्तिता के कारण सिंचाई की आवश्यकता होती है। देश के अधिकांश भाग वर्षाविहीन और सूखाग्रस्त हैं। उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्कन का पठार इसके अंतर्गत आते हैं। देश के अधिकांश भागों में शीत और ग्रीष्म ऋतुओं में न्यूनाधिक शुष्कता पाई जाती है इसलिए शुष्क ऋतुओं में बिना सिंचाई के खेती करना कठिन होता है। पर्याप्त मात्रा में वर्षा वाले क्षेत्र जैसे पश्चिम बंगाल और बिहार में भी मानसून के मौसम में अवर्षा अथवा इसकी असपफलता सूखा जैसी स्थिति उत्पन्न कर देती है जो कॄषि के लिए हानिकारक होती है। कुछ फसलों के लिए जल की कमी सिंचाई को आवश्यक बनाती है। उदाहरण के लिए चावल, गन्ना, जूट आदि के लिए अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है जो केवल सिंचाई द्वारा संभव है। सिंचाई की व्यवस्था बहुफसलीकरण को संभव बनाती है। ऐसा पाया गया है कि सिंचित भूमि की कॄषि उत्पादकता असिंचित भूमि की अपेक्षा ज्यादा होती है। दूसरे, फसलों की अधिक उपज देने वाली किस्मों के लिए आर्द्रता आपूर्ति नियमित रूप से आवश्यक है जो केवल विकसित सिंचाई तंत्र से ही संभव होती है। वास्तव में ऐसा इसलिए है कि देश में कॄषि विकास की हरित क्रांति की रणनीति पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सपफल हुई है।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निवल बोए गए क्षेत्र का 85 प्रतिशत भाग सिंचाई के अंतर्गत है। इन राज्यों में गेहूँ और चावल मुख्य रूप से सिंचाई की सहायता से पैदा किए जाते हैं। निवल सिंचित क्षेत्र का 76-1 प्रतिशत पंजाब में और 51-3 प्रतिशत हरियाणा में, कुओं और नलकूपों द्वारा सिंचित है। इससे यह ज्ञात होता है कि ये राज्य अपने संभावित भौम जल के एक बड़े भाग का उपयोग करते हैं जिससे कि इन राज्यों में भौम जल में कमी आ जाती है । गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, म.प्र., प.बंगाल, उ.प्र. आदि राज्यों में कुओं और नलकूपों से सिंचित क्षेत्र का भाग बहुत अधिक है। इन राज्यों में भौम जल संसाधन के अत्यधिक उपयोग से भौम जल स्तर नीचा हो गया है। वास्तव में, कुछ राज्यों, जैसे– राजस्थान और महाराष्ट्र में अधिक जल निकालने के कारण भूमिगत जल में फलुओराइड का संकेंद्रण बढ़ गया है और इस वजह से पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ भागों में संखिया के संकेंद्रण की वृद्धि हो गई है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गहन सिंचाई से मृदा में लवणता बढ़ रही है और भौम जल सिंचाई में कमी आ रही है।

संभावित जल समस्या

जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धिता, जनसंख्या बढ़ने से दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक, कॄषि और घरेलू निस्सरणों से प्रदूषित होता जा रहा है और इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धिता और सीमित होती जा रही है।

जल के गुणों का ह्रास

जल गुणवत्ता से तात्पर्य जल की शुद्धता अथवा अनावश्यक बाहरी पदार्थों से रहित जल से है। जल बाईँ पदार्थों, जैसे– सूक्ष्म जीवों, रासायनिक पदार्थों, औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्रदूषित होता है। इस प्रकार के पदार्थ जल के गुणों में कमी लाते हैं और इसे मानव उपयोग के योग्य नहीं रहने देते हैं। जब विषैले पदार्थ झीलों, सरिताओं, नदियों, समुद्रों और अन्य  जलाशयों में प्रवेश करते हैं, वे जल में घुल जाते हैं अथवा जल में निलंबित हो जाते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जल के गुणों में कमी आने से जलीय तंत्र (aquatic system)  प्रभावित होते हैं। कभी-कभी प्रदूषक नीचे तक पहुँच जाते हैं और भौम जल को प्रदूषित करते हैं। देश में गंगा और यमुना, दो अत्यधिक प्रदूषित नदियाँ हैं।

जल संरक्षण और प्रबंधन

अलवणीय जल की घटती हुई उपलब्धिता और बढ़ती माँग से, सतत पोषणीय विकास के लिए इस महत्वपूर्ण जीवनदायी संसाधन के संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ गई है।  विलवणीकरण द्वारा सागर/महासागर से प्राप्त जल उपलब्धिता, उसकी अधिक लागत के कारण, नगण्य हो गई है। भारत को जल-संरक्षण के लिए तुरंत कदम उठाने हैं और प्रभावशाली  नीतियाँ और कानून बनाने हैं, और जल संरक्षण हेतु प्रभावशाली उपाय अपनाने हैं। जल बचत तकनीकी और विधयों के विकास के अतिरिक्त, प्रदूषण से बचाव के प्रयास भी करने चाहिए। जल-संभर विकास, वर्षा जल संग्रहण, जल के पुन: चक्रण और पुन: उपयोग और लंबे समय तक जल की आपूर्ति के लिए जल के संयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

जल प्रदूषण का निवारण

उपलब्ध जल संसाधनों का तेजी से निम्नीकरण हो रहा है। देश की मुख्य नदियों के प्राय: पहाड़ी क्षेत्रों के उफपरी भागों तथा कम बसे क्षेत्रों में अच्छी जल गुणवत्ता पाई जाती है। मैदानों में,  नदी जल का उपयोग गहन रूप से कॄषि, पीने, घरेलू और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। अपवाहिकाओं के साथ कॄषिगत ;उर्वरक और कीटनाशक, घरेलू ;ठोस और अपशिष्ट पदार्थ और औद्योगिक बहि:स्राव नदी में मिल जाते हैं। नदियों में प्रदूषकों का संकेंद्रण गर्मी के मौसम में बहुत अधिक होता है क्योंकि उस समय जल का प्रवाह कम होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण  बोर्ड सी-पी-सी-बी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ;एस-पी-सी- के साथ मिलकर 507 स्टेशनों की राष्ट्रीय जल संसाधन की गुणवत्ता का मानीटरन किया जा रहा है। इन स्टेशनों से प्राप्त किया गया आँकड़ा दर्शाता है कि जैव और जीवाणविक संदूषण नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। दिल्ली और इटावा के बीच यमुना नदी देश में सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। दूसरी प्रदूषित नदियाँ अहमदाबाद में साबरमती, लखनउफ में गोमती, मदुरई में काली, अडयार, कूअम ;संपूर्ण विस्तारद्ध, वैगई, हैदराबाद में मूसी तथा कानपुर और वाराणसी में गंगा है। भौम जल प्रदूषण  देश के विभिन्न भागों में भारी/विषैली धातुओं, फ़्लूओराइड और नाइट्रेट्‌स के संकेंद्रण के कारण होता है।

वैधानिक व्यवस्थाएँ, जैसे– जल अधनियम 1974 ;प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं हुए हैं। परिणाम यह है कि 1997 में प्रदूषण पैफलाने वाले 251 उद्योग, नदियों और झीलों के किनारे स्थापित किए गए थे। जल उपकर अधिनियम 1977, जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना है, उसके भी सीमित प्रभाव हुए। जल के महत्व और जल प्रदूषण के अधिप्रभावों के बारे में जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है। जन जागरूकता और उनकी भागीदारी से, कॄषिगत कार्यो तथा घरेलू और औद्योगिक विसर्जन से प्राप्त प्रदूषकों में बहुत प्रभावशाली ढंग से कमी लाई जा सकती है।

जल का पुन: चक्र और पुन: उपयोग

पुन: चक्र और पुन: उपयोग, दूसरे रास्ते हैं जिनके द्वारा अलवणीय जल की उपलब्धिता को सुधारा जा सकता है। कम गुणवत्ता के जल का उपयोग, जैसे शोधित अपशिष्ट जल, उद्योगों के लिए एक आकर्षक विकल्प हैं और जिसका उपयोग शीतलन एवं अग्निशमन के लिए करके वे जल पर होने वाली लागत को कम कर सकते हैं। इसी तरह नगरीय क्षेत्रों में स्नान और बर्तन धोने में प्रयुक्त जल को बागवानी के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। वाहनों को धोने के लिए प्रयुक्त जल का उपयोग भी बागवानी में किया जा सकता है। इससे अच्छी गुणवत्ता वाले जल का पीने के उद्देश्य के लिए संरक्षण होगा। वर्तमान में, पानी का पुन: चक्रण एक सीमित माप में किया गया है। फिर भी, पुन: चक्रण द्वारा पुन: पूर्तियोग्य जल की उपादेयता व्यापक है।

जल संभर प्रबंधन

जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधयों, जैसे– अंत: स्रवण तालाब,  पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल हैं। तथापि, विस्तृत अर्थ में जल संभर प्रबंधन के अंतर्गत सभी संसाधनों– प्राकॄतिक ;जैसे– भूमि, जल, पौधे और प्राणियों और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकॄतिक संसाधनों और समाज के बीच संतुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से संप्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

केंद्रीय और राज्य सरकारों ने देश में बहुत से जल- संभर विकास और प्रबंधन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए जा रहे हैं। ‘हरियाली’ केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण के लिए योग्य बनाना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है। नीरू-मीरू ;जल और आप कार्यक्रम ;आंध्र प्रदेश में और अरवारी पानी संसद ;अलवर राजस्थान में के अंतर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ जैसे– अंत: स्रवण तालाब ताल जोहड़ की खुदाई की गई है और रोक बाँध बनाए गए हैं। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक कर दिया गया है।

किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण संरचना बनाए नहीं किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने में सपफल हुई हैं। फिर भी सफलता कुछ की ही कहानियाँ हैं। अधिकांश घटनाओं में, कार्यक्रम  अपनी उदीयमान अवस्था पर ही हैं। देश में लोगों के बीच जल संभर विकास और प्रबंधन के लाभों को बताकर जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है और इस एकीकॄत जल संसाधन प्रबंधन उपागम द्वारा जल उपलब्धिता सतत पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।

वर्षा जल संग्रहण

वर्षा जल संग्रहण विभिन्न उपयोगों के लिए वर्षा के जल को रोकने और एकत्र करने की विध है। इसका उपयोग भूमिगत जलभृतों के पुनर्भरण के लिए भी किया जाता है। यह एक कम मूल्य और पारिस्थितिकी अनुकूल विध है जिसके द्वारा पानी की प्रत्येक बूँद संरक्षित करने के लिए वर्षा जल को नलकूपों, गड्‌ढों और कुओं में एकत्र किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण पानी की उपलब्धिता को बढ़ाता है, भूमिगत जल स्तर को नीचा होने से रोकता है, फ़लुओराइड और नाइट्रेट्‌स जैसे संदूषकों को कम करके अवमिश्रण भूमिगत जल की गुणवत्ता बढ़ाता है, मृदा अपरदन और बाढ़ को रोकता है और यदि इसे जलभृतों के पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जाता है तो तटीय क्षेत्रों में लवणीय जल के प्रवेश को रोकता है।

देश में विभिन्न समुदाय लंबे समय से अनेक विधियों से वर्षाजल संग्रहण करते आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत वर्षा जल संग्रहण सतह संचयन जलाशयों, जैसे– झीलों, तालाबों, सिंचाई तालाबों आदि में किया जाता है। राजस्थान में वर्षा जल संग्रहण ढाँचे जिन्हें कुंड अथवा टाँका ;एक ढका हुआ भूमिगत टंकी के नाम से जानी जाती है जिनका निर्माण घर अथवा गाँव के पास या घर में संग्रहित वर्षा जल को एकत्र करने के लिए किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण के विभिन्न विधियों को समझने के लिए चित्र  देखिए।

चित्र

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बहुमूल्य जल संसाधन के संरक्षण के लिए वर्षा जल संग्रहण प्रविध का उपयोग करने का क्षेत्र व्यापक है। इसे घर की छतों और खुले स्थानों में वर्षा जल द्वारा संग्रहण किया जा सकता है। वर्षा जल संग्रहण घरेलू उपयोग के लिए, भूमिगत जल पर समुदाय की निर्भरता कम करता है। इसके अतिरिक्त माँग-आपूर्ति अंतर के लिए सेतु बंधन के कार्य के अतिरिक्त इससे भौम जल निकालने में ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि पुनर्भरण से भौम जल स्तर में वृद्धि हो जाती है। आजकल वर्षा जल संग्रहण विधि का देश के बहुत से राज्यों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।

वर्षा जल संग्रहण से मुख्य रूप से नगरीय क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है क्योंकि जल की माँग, अधिकांश नगरों और शहरों में पहले ही आपूर्ति से आगे बढ़ चुकी हैं। उपर्युक्त कारकों के अतिरिक्त विशेषकर तटीय क्षेत्रों में पानी के विलवणीकरण और शुष्क और अधर्शुष्क क्षेत्रों में खारे पानी की समस्या, नदियों को जोड़कर अधिक जल के क्षेत्रों से कम जल के क्षेत्रों में जल स्थानांतरित करके भारत में जल समस्या को सुलझाने का महत्वपूर्ण उपाय हैं। फिर भी, वैयक्तिक उपभोक्ता, घरेलू और समुदायों के दृष्टिकोण से, सबसे बड़ी समस्या जल का मूल्य है।

भोजन सभी सजीवों की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। हमारे भोजन के मुख्य अवयव कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा हैं। अल्प मात्रा में विटामिन एवं खनिज लवणों की भी आवश्यकता होती है। भोजन से ई…र्जा एवं कई कच्चे कायिक पदार्थ प्राप्त होते हैं जो वृद्धि एवं ई…तकों के मरम्मत के काम आते हैं। जो जल हम ग्रहण करते हैं, वह उपापचयी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है एवं शरीर के निर्जलीकरण को भी रोकता है। हमारा शरीर भोजन में उपलब्ध जैव-रसायनों को उनके मूल रूप में उपयोग नहीं कर सकता। अत: पाचन तंत्र में छोटे अणुओं में विभाजित कर साधारण पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है। जटिल पोषक पदार्थों को अवशोषण योग्य सरल रूप में परिवर्तित करने की इसी क्रिया को पाचन कहते हैं और हमारा पाचन तंत्र इसे याँत्रिक एवं रासायनिक विधियों द्वारा संपन्न करता है। मनुष्य का पाचन तंत्र चित्र  में दर्शाया गया है।

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1 पाचन तंत्र

मनुष्य का पाचन तंत्र आहार नाल एवं सहायक ग्रंथियों से मिलकर बना होता है।

1-1 आहार नाल

आहार नाल अग्र भाग में मुख से प्रारंभ होकर पश्च भाग में स्थित गुदा द्वारा बाहर की ओर खुलती है। मुख, मुखगुहा में खुलता है। मुखगुहा में कई दांत और एक पेशीय जिह्वा होती है। प्रत्येक दांत जबड़े में बने एक सांचे में स्थित होता है।

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;चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-2 इस तरह की व्यवस्था को गर्तदंती (thecodont) कहते हैं। मनुष्य सहित अधिकांश स्तनधरियों के जीवन काल में दो तरह के दांत आते हैं- अस्थायी दांत-समूह अथवा दूध् के दांत जो वयस्कों में स्थायी दांतों से प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इस तरह की दांत दंत-व्यवस्था को द्विबारदंती (Diphyodont)  कहते हैं। वयस्क मनुष्य में 32 स्थायी दांत होते हैं, जिनके चार प्रकार हैं जैसे- कॄंतक ;I, रदनक ;C अग्र-चर्वणक ;PM और चर्वणक ;M। ऊपरी एवं निचले जबड़े के प्रत्येक आधे भाग में  दांतों की व्यवस्था I, C, PM, M में एक दंतसूत्र के अनुसार होती है जो मनुष्य के लिए 2123/2123 है। इनैमल से बनी दांतों की चबाने वाली कठोर सतह भोजन को चबाने में मदद करती है। जिह्वा स्वतंत्र रूप से घूमने योग्य एक पेशीय अंग है जो फ़ेनुलम (frenulum) द्वारा मुखगुहा की आधर से जुड़ी होती है। जिह्वा की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे उभार के रूप में पिप्पल ;पैपिला होते हैं, जिनमें कुछ पर स्वाद कलिकाएं होती हैं।

मुखगुहा एक छोटी ग्रसनी में खुलती है जो वायु एवं भोजन, दोनों का ही पथ है। उपास्थिमय घाँटी ढक्कन, भोजन को निगलते समय श्वासनली में प्रवेश करने से रोकती है। ग्रसिका (oesophagus) एक पतली लंबी नली है, जो गर्दन, वक्ष एवं मध्यपट से होते हुए पश्च भाग में  थैलीनुमा आमाशय में खुलती है। ग्रसिका का आमाशय में खुलना एक पेशीय ;आमाशय-ग्रसिका अवरोधिनी द्वारा नियंत्रित होता है। आमाशय ;गुहा के ऊपरी बाएं भाग में स्थित होता है, को मुख्यत: तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- जठरागम भाग जिसमें
ग्रसिका खुलती है, फडिस क्षेत्र और जठरनिर्गमी भाग जिसका छोटी आंत में निकास होता है ;चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-3।

छोटी आंत के तीन भाग होते हैं- ‘J’ आकार की ग्रहणी, कुंडलित मध्यभाग अग्रक्षुद्रांत्र और लंबी कुंडलित क्षुद्रांत्र। आमाशय का ग्रहणी में निकास जठरनिर्गम अवरोधिनी द्वारा नियंत्रित होता है। क्षुद्रांत्र बड़ी आंत में खुलती है जो अंधनाल, वृहदांत्र और मलाशय से बनी होती है। अंधनाल एक छोटा थैला है जिसमें कुछ सहजीवीय सूक्ष्मजीव रहते हैं। अंधनाल से एक अंगुली जैसा प्रर्वध्, परिशेषिका निकलता है जो एक अवशेषी अंग है। अंधनाल, बड़ी आंत में खुलती है।

चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-3।amashay

 

वृहदांत्र तीन भागों में विभाजित होता है- आरोही, अनुप्रस्थ एवं अवरोही भाग। अवरोही भाग मलाशय में खुलता है जो मलद्वार (anus) द्वारा बाहर खुलता है। आहार नाल की दीवार में ग्रसिका से मलाशय तक, चार स्तर होते हैं ;चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-4 जैसे सिरोसा, मस्कुलेरिस, सबम्यूकोसा और म्युकोसा। सिरोसा सबसे बाहरी परत है और एक पतली मेजोथिलियम ;अंतरंग अंगों की उपकला और कुछ संयोजी ऊ…तकों से बनी होती है। मस्कुलेरिस प्राय: आंतरिक वर्तुल पेशियों एवं बाईँ अनुदैर्घ्य पेशियों की बनी होती है। कुछ भागों में एक तिर्यक पेशी स्तर होता है। सबम्यूकोसा स्तर रुधिर, लसीका व तंत्रिकाओं युक्त मुलायम संयोजी ई…तक की बनी होती है। ग्रहणी में, कुछ ग्रंथियाँ भी सबम्यूकोसा में पाई जाती हैं। आहार नाल की ल्यूमेन की सबसे भीतरी परत म्यूकोसा है। यह स्तर आमाशय में अनियमित वलय एवं छोटी आंत में अंगुलीनुमा प्रवर्ध् बनाता है जिसे अंकुर ;(villi) कहते हैं ;चित्र 5। अंकुर की सतह पर स्थित कोशिकाओं से असंख्य सूक्ष्म प्रवर्ध् निकलते हैं जिन्हें सूक्ष्म अंकुर कहते हैं, जिससे ब्रस-बार्डर जैसा लगता है। यह रूपांतरण सतही क्षेत्र को अत्यधिक बढ़ा देता है।

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अंकुरों में केशिकाओं का जाल फ़ैला रहता है और एक बड़ी लसीका वाहिका ;(vessel) होती है जिसे लैक्टीयल कहते हैं। म्यूकोसा की उपकला पर कलश-कोशिकाएं होती हैं, जो स्नेहन के लिए म्यूकस का स्राव करती हैं। म्यूकोसा आमाशय और आंत में स्थित अंकुरों के आधरों के बीच लीबरकुन-प्रगुहिका ; ( crypts of Lieberkuhn) भी कुछ ग्रंथियों का निर्माण करती है। सभी चारों परतें आहार नाल के विभिन्न भागों में रूपांतरण दर्शाती हैं।

1-2 पाचन ग्रंथियाँ

आहार नाल से संबंधित पाचन ग्रंथियों में लार ग्रंथियाँ, यकॄत और अग्नाशय शामिल हैं। लार का निर्माण तीन जोड़ी ग्रंथियों द्वारा होता है। ये हैं गाल में कर्णपूर्व, निचले जबड़े में अधोजंभ/अवचिबुकीय तथा जिह्वा के नीचे स्थित अधेजिह्‌वा। इन ग्रंथियों से लार मुखगुहा में पहुंचती है।

यकॄत (liver) मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जिसका वयस्क में भार लगभग 1-2 से 1-5 किलोग्राम होता है। यह उदर में मध्यपट के ठीक नीचे स्थित होता है और इसकी दो पालियाँ ;(lobes) होती हैं। यकॄत पालिकाएं यकॄत की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाइयां हैं जिनके अंदर यकॄत कोशिकाएं रज्जु की तरह व्यवस्थित रहती हैं। प्रत्येक पालिका संयोजी ऊ…तक की एक पतली परत से ढकी होती है जिसे ग्लिसंस केपसूल कहते हैं। यकॄत की कोशिकाओं से पित्त का स्राव होता है जो यकॄत नलिका से होते हुए एक पतली पेशीय थैली- पित्ताशय में सांद्रित एवं जमा होता है। पित्ताशय की नलिका यकॄतीय नलिका से मिलकर एक मूल पित्त वाहिनी बनाती है ;चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-6। पित्ताशयी नलिका एवं अग्नाशयी नलिका, दोनों मिलकर यकॄत अग्नाशयी वाहिनी द्वारा ग्रहणी में खुलती है जो ओडी अवरोधिनी से नियंत्रित होती हैं।

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अग्नाशय U आकार के ग्रहणी के बीच स्थित एक लंबी ग्रंथि है जो बहि: स्रावी और अंत: स्रावी, दोनों ही ग्रंथियों की तरह कार्य करती है। बहि: स्रावी भाग से क्षारीय अग्नाशयी स्राव निकलता है, जिसमें एंजाइम होते हैं और अंत: स्रावी भाग से इंसुलिन और ग्लुकेगोन नामक हार्मोन का स्राव होता है।

2 भोजन का पाचन

पाचन की प्रक्रिया यांत्रिक एवं रासायनिक विधियों द्वारा संपन्न होती है। मुखगुहा के मुख्यत: दो प्रकार्य हैं, भोजन का चर्वण और निगलने की क्रिया। लार की मदद से दांत और जिह्वा भोजन को अच्छी तरह चबाने एवं मिलाने का कार्य करते हैं। लार का श्लेष्म भोजन कणों को चिपकाने एवं उन्हें बोलस में रूपांतरित करने में मदद करता है। इसके उपरांत निगलने की क्रिया द्वारा बोलस ग्रसनी से ग्रसिका में चला जाता है। बोलस पेशीय संकुचन के क्रमाकुंचन (peristalsis) द्वारा ग्रसिका में आगे बढ़ता है। जठर-ग्रसिका अवरोधिनी भोजन के अमाशय में प्रवेश को नियंत्रित करती है। लार ;मुखगुहा में विद्युत-अपघट्‌य (electrolytes) (Na+, K+, Cl-, HCO3) और एंजाइम ;लार एमाइलेज या टायलिन तथा लाइसोजाइम होते हैं। पाचन की रासायनिक प्रक्रिया मुखगुहा में कार्बोहाइड्रेट को जल अपघटित करने वाली एंजाइम टायलिन या लार एमाइलेज की सक्रियता से प्रारंभ होती है। लगभग 30 प्रतिशत स्टार्च इसी एंजाइम की सक्रियता (pH 6-8) से द्विशर्करा माल्टोज में अपघटित होती है। लार में उपस्थित लाइसोजाइम जीवाणुओं के संक्रमण को रोकता है।

          लार एमाइलेज
स्टार्च————————> माल्टोज
           (pH 6-8)
        
आमाशय की म्यूकोसा में जठर ग्रंथियाँ स्थित होती हैं। जठर ग्रंथियों में मुख्य रूप से तीन प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, यथा-
(i) म्यूकस का स्राव करने वाली श्लेषमा ग्रीवा कोशिकाएं
(ii) पेप्टिक या मुख्य कोशिकाएं जो प्रोएंजाइम पेप्सिनोजेन का स्राव करती हैं तथा;
(iii) भित्तीय या ऑक्सिन्टिक कोशिकाएं जो हाइड्राक्लोरिक अम्ल और नैज कारक स्रावित करती हैं ;नैज कारक विटामिन B12 के अवशोषण के लिए आवश्यक है।

अमाशय 4-5 घंटे तक भोजन का संग्रहण करता है। आमाशय की पेशीय दीवार के संकुचन द्वारा भोजन अम्लीय जठर रस से पूरी तरह मिल जाता है जिसे काइम (chyme) कहते हैं।

प्रोएंजाइम पेप्सिनोजेन हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के संपर्क में आने से सक्रिय एंजाइम पेप्सिन में परिवर्तित हो जाता है जो आमाशय का प्रोटीन-अपघटनीय एंजाइम है। पेप्सिन प्रोटीनों को प्रोटियोज तथा पेप्टोंस ;पेप्टाइडों में बदल देता है। जठर रस में उपस्थित श्लेष्म एवं बाइकार्बोनेट श्लेष्म उपकला स्तर का स्नेहन और अत्यधिक सांद्रित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से उसका बचाव करते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल पेप्सिनों के लिए उचित अम्लीय माध्यम (pH 1-8) तैयार करता है। नवजातों के जठर रस में रेनिन नामक प्रोटीन अपघटनीय एंजाइम होता है जो दूध के प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है। जठर ग्रंथियाँ थोड़ी मात्रा में लाइपेज भी स्रावित करती हैं।

छोटी आंत का पेशीय स्तर कई तरह की गतियां उत्पन करता है। इन गतियों से भोजन विभिन्न स्रावों से अच्छी तरह मिल जाता है और पाचन की क्रिया सरल हो जाती है। यकॄत अग्नाशयी नलिका द्वारा पित्त, अग्नाशयी रस और आंत्र-रस छोटी आंत में छोड़े जाते हैं। अग्नाशयी रस में टि्रप्सिनोजन, काइमोटि्रप्सिनोजन, प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस, एमाइलेज और न्युक्लिएज एंजाइम निष्क्रिय रूप में होते हैं। आंत्र म्यूकोसा द्वारा स्रावित ऐंटेरोकाइनेज द्वारा टि्रप्सिनोजन सक्रिय टि्रप्सिन में बदला जाता है जो अग्नाशयी रस के अन्य एंजाइमों को
सक्रिय करता है।

ग्रहणी में प्रवेश करने वाले पित्त में पित्त वर्णक ;विलिरूबिन एवं विलिवख्रडनद्ध, पित्त लवण, कोलेस्टेरॉल और पफास्पफोलिपिड होते हैं, लेकिन कोई एंजाइम नहीं होता। पित्त वसा के इमल्सीकरण में मदद करता है और उसे बहुत छोटे मिसेल कणों में तोड़ता है। पित्त लाइपेज एंजाइम को भी सक्रिय करता है। आंत्र श्लेषमा उपकला में गोब्लेट कोशिकाएं होती हैं जो श्लेषमा का स्राव करती है। म्यूकोसा के ब्रस बॉर्डर कोशिकाओं और गोब्लेट कोशिकाओं के स्राव आपस में मिलकर आंत्र स्राव अथवा सक्कस एंटेरिकस बनाते हैं। इस रस में कई तरह के एंजाइम होते हैं, जैसे-ग्लाइकोसिडेज डायपेप्टिडेज, एस्टरेज, न्यूक्लियोसिडेज आदि।

म्यूकस अग्नाशय के बाइकार्बोनेट के साथ मिलकर आंत्र म्यूकोसा की अम्ल के दुष्प्रभाव से रक्षा करता है तथा एंजाइमों की सक्रियता के लिए आवश्यक क्षारीय माध्यम (pH 7-8) तैयार करता है। इस प्रक्रिया में सब-म्यूकोसल ब्रूनर ग्रंथि भी मदद करती है। आंत में पहुँचने वाले काइम में उपस्थित प्रोटीन, प्रोटियोज और पेप्टोन ;आंशिक अपघटित प्रोटीन अग्नाशय रस के प्रोटीन अपघटनीय एंजाइम निम्न रूप से क्रिया करते हैं:

प्रोटीन      ।    ट्रिप्सिन/काइमोट्रिप्सिन
प्रोटियोज    ।  ——————————-> डाईपेप्टाइड
पेप्टोन      ।       कार्बोक्सीपेप्डेज

काइम के कार्बोहाइड्रेट अग्नाशयी एमाइलेज द्वारा डायसैकेराइड में जलापघटित होते हैं।

                                 एमाइलेज
पालीसेकेराइड(स्टार्च)——————> डाईसेकेराइड

वसा पित्त की मदद से लाइपेजेज द्वारा क्रमश: डाई और मोनोग्लिसेराइड में टूटते हैं।

वसा——-> डाइग्लिसेराइड ——-> मोनोग्लिसेराइड

अग्नाशयी रस के न्यूक्लिएस न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लियोटाइड और न्यूक्लियोसाइड में पाचित करते हैं।

 न्यूक्लिक अम्ल——–> न्यूक्लियोटाइड———> न्यूक्लियोसाइड

 आंत्र रस के एंजाइम उपर्युक्त अभिक्रियाओं के अंतिम उत्पादों को पाचित कर अवशोषण योग्य सरल रूप में बदल देते हैं। पाचन के ये अंतिम चरण आंत के म्यूकोसल उपकला कोशिकाओं के बहुत समीप संपन्न होते हैं।

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ऊपर वर्णित जैव वृहत्‌ अणुओं के पाचन की क्रिया आंत्र के ग्रहणी भाग में संपन्न होती हैं। इस तरह निर्मित सरल पदार्थ छोटी आंत के अग्रक्षुद्रांत्र और क्षुद्रांत्र भागों में अवशोषित होते हैं। अपचित तथा अनावशोषित पदार्थ बड़ी आंत में चले जाते हैं। बड़ी आंत में कोई महत्वपूर्ण पाचन क्रिया नहीं होती है। बड़ी आंत का कार्य है-1 कुछ जल, खनिज एवं औषधका अवशोषण ;
2 श्लेष्म का स्राव जो अपचित उत्सर्जी पदार्थ कणों को चिपकाने और स्नेहन होने के कारण उनका बाईँ निकास आसान बनाता है। अपचित और अवशोषित पदार्थों को मल कहते हैं, जो अस्थायी रूप से मल त्यागने से पहले तक मलाशय में रहता है।

जठरांत्रिक पथ की क्रियाएं विभिन्न अंगों के उचित समन्वय के लिए तंत्रिका और हॉर्मोन के नियंत्रण से होती है। भोजन के भोज्य पदार्थों को देखने, उनकी गंध और/अथवा मुखगुहा नली में उपस्थिति लार ग्रंथियों को स्राव के लिए उद्दीपित कर सकती हैं। इसी प्रकार जठर और आंत्रिक स्राव भी तंत्रिका संकेतों से उद्दीप्त होते हैं। आहार नाल के विभिन्न भागों की पेशियों की सक्रियता भी स्थानीय एवं केंद्रीय तंत्रिकीय क्रियाओं द्वारा नियमित होती हैं। हार्मोनल नियंत्रण के अंतर्गत, जठर और याँत्रिक म्यूकोसा से निकलने वाले हार्मोन पाचक रसों के स्राव को नियंत्रित करते हैं।

3 पाचित उत्पादों का अवशोषण-

अवशोषण वह प्रक्रिया है, जिसमें पाचन से प्राप्त उत्पाद यांत्रिक म्यूकोसा से निकलकर रक्त या लसीका में प्रवेश करते हैं। यह निष्क्रिय, सक्रिय अथवा सुसाध्य परिवहन क्रियाविधियों द्वारा संपादित होता है। ग्लुकोज, ऐमीनो अम्ल, क्लोराइड आयन आदि की थोड़ी मात्रा सरल विसरण प्रक्रिया द्वारा रक्त में पहुंच जाती हैं। इन पदार्थों का रक्त में पहुंचना सांद्रण-प्रवणता (concentration gradient) पर निर्भर है। जबकि लैक्टोज और कुछ अन्य ऐमीना अम्लों का परिवहन वाहक अणुओं जैसे सोडियम आयन की मदद से पूरा होता है। इस क्रियाविधिको सुसाध्य परिवहन कहते हैं।

जल का परिवहन परासरणी प्रवणता पर निर्भर करता है। सक्रिय परिवहन सांद्रण-प्रवणता के विरु होता है जिसके लिए ऊ…र्जा की आवश्यकता होती है। विभिन्न पोषक तत्वों जैसे ऐमीनो अम्ल, ग्लुकोस ;मोनोसैकेराइड और सोडियम आयन ;विद्युत-अपघट्‌य का रक्त में अवशोषण इसी क्रियाविधि द्वारा होता है। वसाम्ल और ग्लिसेरॉल अविलेय होने के कारण रक्त में  अवशोषित नहीं हो पाते। सर्वप्रथम वे विलेय सूक्ष्म बूंदों में समाविष्ट होकर आंत्रिक म्यूकोसा में चले जाते हैं जिन्हें मिसेल (micelles) कहते हैं। ये यहाँ प्रोटीन आस्तरित सूक्ष्म वसा गोलिका में पुन: संरचित होकर अंकुरों की लसीका वाहिनियों ;लेक्टियल में चले जाते हैं। ये लसीका वाहिकाएं अंतत: अवशोषित पदार्थों को रक्त प्रवाह में छोड़ देती हैं।

पदार्थों का अवशोषण आहारनाल के विभिन्न भागों जैसे-मुख, आमाशय, छोटी आंत और बड़ी आंत में होता है। परंतु सबसे अधिक अवशोषण छोटी आंत में होता है। अवशोषण सारांश ;अवशोषण- स्थल और पदार्थ तालिका 1 में दिया गया है। अवशोषित पदार्थ अंत में ई…तकों में पहुंचते हैं जहाँ वे विभिन्न क्रियाओं के उपयोग में लाए जाते हैं। इस प्रक्रिया को स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं।

पाचक अवशिष्ट मलाशय में कठोर होकर संब मल वन जाता है जो तांत्रिक प्रतिवर्ती (neural reflex) क्रिया को शुरू करता है जिससे मलत्याग की इच्छा पैदा होती है। मलद्वार से मल का बहिक्षेपण एक ऐच्छिक क्रिया है जो एक बृहत्‌ क्रमाकुंचन गति से पूरी होती है।

4 पाचन तंत्र के विकार (Disorder) और अनियमितताएं

आंत्र नलिका का शोथ जीवाणुओं और विषाणुओं के संक्रमण से होने वाला एक सामान्य विकार है। आंत्र का संक्रमण परजीवियों, जैसे- फीता कॄमि, गोलकॄमि, सूत्रकॄमि, हुकवर्म, पिनवर्म, आदि से भी होता है।

पीलिया (Jaundice) : इसमें यकॄत प्रभावित होता है। पीलिया में त्वचा और आंख पित्त वर्णकों के जमा होने से पीले रंग के दिखाई देते हैं।

वमन (Vomiting) : यह आमाशय में संगृहीत पदार्थों की मुख से बाहर निकलने की क्रिया है। यह प्रतिवर्ती क्रिया मेडुला में स्थित वमन केंद्र से नियंत्रित होती है। उल्टी से पहले बेचैनी की अनुभूति होती है।

प्रवाहिका (Diarrhoea) : आंत्र ;इवूमस की अपसामान्य गति की बारंबारता और मल का अत्यधिक पतला हो जाना प्रवाहिका (Diarrhoea) कहलाता है। इसमें भोजन अवशोषण की क्रिया घट जाती है।

कोष्ठबद्धता या कब्ज (Constipation) : कब्ज में, मलाशय में मल रुक जाता है और आंत्र की गतिशीलता अनियमित हो जाती है।

अपच (Indigestion) : इस स्थिति में, भोजन पूरी तरह नहीं पचता है और पेट भरा-भरा महसूस होता है। अपच एंजाइमों के स्राव में कमी, व्यग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिक भोजन करने, एवं मसालेदार भोजन करने के कारण होती है।

सारांश

मानव के पाचन तंत्र में एक आहार नाल और सहयोगी ग्रंथियाँ होती हैं। आहर नाल मुख, मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका, आमाशय, क्षुद्रांत्र, वृहदांत्र, मलाशय और मलद्वार से बनी होती है। सहायक पाचन ग्रंथियों में लार ग्रंथि, यकॄत ;पित्ताशय सहित और अग्नाशय हैं। मुख के अंदर दाँत भोजन को चबाते हैं, जीभ स्वाद को पहचानती है और भोजन को लार के साथ मिलाकर इसे अच्छी तरह से चबाने के लिए सुगम बनाती है। लार में मंड या मांड ;स्टार्च पचाने वाली पाचक एंजाइम, लार एमिलेज होती है जो मांड को पचाकर माल्टोस ;डाइसैकेराइड में बदल देती हैं। इसके बाद भोजन ग्रसनी से होकर बोलस के रूप में ग्रसिका में प्रवेश करता है, जो आगे क्रमाकुंचन द्वारा आमाशय तक ले जाया जाता है। आमाशय में मुख्यत: प्रोटीन का पाचन होता है। सरल शर्कराओं, अल्कोहल और दवाओं का भी आमाशय में अवशोषण होता है।

काइम क्षुद्रांत्र के ग्रहणी भाग में प्रवेश करता है जहाँ अग्नाशयी रस, पित्त और अंत में आंत्र रस के एंजाइमों द्वारा कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का पाचन पूरा होता है। इसके बाद भोजन छोटी आँत के अग्र क्षुद्रांत्र ;जेजुनम और क्षुद्रांत्र ;इलियम भाग में जाता है। पाचन के पश्चात कार्बोहाइड्रट, ग्लुकोस जैसे- मोनोसैकेराइड में परिवर्तित हो जाते हैं। अंतत: प्रोटीन टूटकर ऐमीनो अम्लों में तथा वसा, वसीय अम्लों और ग्लिसेराल में परिवर्तित हो जाते हैं। आँत-उत्पादों का पाचित आँत अंकुरों के उपकला स्तर द्वारा शरीर में अवशोषित हो जाता है। अपचित भोजन ;मल त्रिकांत्र (ileoceacal) कपाट द्वारा वृहदांत्र की अंधनाल (caecum) में प्रवेश करता है। इलियो सीकल कपाट मल को वापस नहीं जाने देता। अधिकांश जल बड़ी आँत में अवशोषित हो जाता है। अपचित भोजन अर्ध ठोस होकर मलाशय और गुदा नाल में पहुंचता है और अंतत: गुदा द्वारा बहि:क्षेपित हो जाता है।

प्रत्याख्यान-

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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